इंग्लैंड में पहला स्कूल 1811 में खुला उस समय भारत में 732000 गुरुकुल थे, लोक कल्याण का समृद्ध विज्ञान पढाने वाले इतने गुरूकुल किसने समाप्त किए?, जाने गोपनीय मंत्रों के बीजों का उच्चारण और प्रयोग

वैश्विक हिंदी सम्मेलन – जिस देश के गुरुकुल इतने समृद्ध हों उस देश को आखिर कैसे गुलाम बनाया गया होगा ? आइए जानते हैं हमारे गुरुकुल कैसे बन्द हुए।

इंग्लैंड में पहला स्कूल 1811 में खुला उस समय भारत में 7,32,000 गुरुकुल थे,

*मैकाले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी “देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था” को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह “अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था” लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे।*
*1850 तक इस देश में “7 लाख 32 हजार” गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे “7 लाख 50 हजार” मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में उच्च शिक्षण संस्थान ‘Higher Learning Institute’ हुआ करते थे। उन सबमें 18 विषय पढ़ाए जाते थे और ये गुरुकुल समाज के लोग मिलके चलाते थे न कि राजा, महाराजा।*
अंग्रेजों का एक अधिकारी था जी डब्ल्यू लूथर और दूसरा था टोमस मुनरो ! दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। लूथर, जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और मुनरो, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100% साक्षरता है।*
*मैकाले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है– “कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले उसे पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।”* *इस लिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया। जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज की तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया, उनमें आग लगा दी, उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला।

*गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया। उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था। इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी, ये तीनों गुलामी ज़माने के यूनिवर्सिटी

मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमें वो लिखता है कि- “इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।”*

*उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ साफ दिखाई दे रही है और उस अधिनियम (एक्ट) की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, जबकि अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, हम तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, उस देश का कैसे कल्याण संभव है ?*

*हमारी पुरानी शिक्षा पद्धति बहुत ही समृद्ध और विशाल थी और यही कारण था कि हम विश्वगुरु थे। हमारी शिक्षा पद्धति से पैसे कमाने वाले मशीन पैदा नहीं होते थे बल्कि मानवता के कल्याण हेतु अच्छे और विद्वान इंसान पैदा होते थे। आज तो जो बहुत पढ़ा लिखा है वही सबसे अधिक भ्रष्ट है, वही सबसे बड़ा चोर है।*

*हमने अपना इतिहास गवां दिया है। क्योंकि अंग्रेज हमसे हमारी पहचान छीनने में सफल हुए। उन्होंने हमारी शिक्षा पद्धति को बर्बाद कर के हमें अपनी संस्कृति, मूल धर्म, ज्ञान और समृद्धि से अलग कर दिया। आज जो स्कूलों और कॉलेजों का हाल है वो क्या ही लिखा जाए ! हम न जाने ऐसे लोग कैसे पैदा कर रहें हैं जिनमें जिम्मेवारी का कोई एहसास नहीं है। जिन्हें सिर्फ़ पद और पैसों से प्यार है। हम इतने असफल कैसे होते जा रहें हैं ?*

किसी भी समाज की स्थिति का अनुमान वहां के शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति से लगाया जा सकता है। आज हम इसमें बहुत असफल हैं। हमने स्कूल और कॉलेज तो बना लिए लेकिन जिस उद्देश्य के लिए इसका निर्माण हुआ उसकी पूर्ति के योग्य इंसान और प्रणाली (सिस्टम) नहीं बना पाए। जब आप अपने देश का इतिहास पढ़ेंगे तो आप गर्व भी महसूस करेंगे और रोएंगे भी क्योंकि आपने जो गवां दिया है वो पैसों रुपयों से नहीं खरीदा जा सकता। *हमें एक बड़े पुनर्जागरण की जरूरत है। सरकारें आएंगी जाएंगी, इनसे बहुत उम्मीद करना बेवकूफी होगी, जनता जब तक नहीं जागती हम अपनी विरासत को कभी पुनः हासिल नहीं कर पाएंगे। *जागना होगा और कोई विकल्प नहीं।

हमारी ज्ञान-विज्ञान की शब्दावली के कुछ उदाहरण –
01 *अग्नि विद्या* (Metallurgy) 02 *वायु विद्या* (Flight) 03 *जल विद्या* (Navigation) 04 *अंतरिक्ष विद्या* (Space Science) 05 *पृथ्वी विद्या* (Environment) 06 *सूर्य विद्या* (Solar Study) 07 *चन्द्र व लोक विद्या* (Lunar Study)
08 *मेघ विद्या* (Weather Forecast) 09 *पदार्थ विद्युत विद्या* (Battery) 10 *सौर ऊर्जा विद्या* (Solar Energy) 11 *दिन रात्रि विद्या* 12 *सृष्टि विद्या* (Space Research) 13 *खगोल विद्या* (Astronomy) 14 *भूगोल विद्या* (Geography)
15 *काल विद्या* (Time) 16 *भूगर्भ विद्या* (Geology Mining) 17 *रत्न व धातु विद्या* (Gems & Metals) 18 *आकर्षण विद्या* (Gravity) 19 *प्रकाश विद्या* (Solar Energy) 20 *तार विद्या* (Communication) 21 *विमान विद्या* (Plane)
22 *जलयान विद्या* (Water Vessels) 23 *अग्नेय अस्त्र विद्या* (Arms & Ammunition) 24 *जीव जंतु विज्ञान विद्या* (Zoology Botany) 25 *यज्ञ विद्या* (Material Sic)

*ये तो बात हुई वैज्ञानिक विद्याओं की, अब बात करते हैं व्यावसायिक और तकनीकी विद्या की।*

26 *वाणिज्य* (Commerce) 27 *कृषि* (Agriculture) 28 *पशुपालन* (Animal Husbandry) 29 *पक्षिपलन* (Bird Keeping) 30 *पशु प्रशिक्षण* (Animal Training) 31 *यान यन्त्रकार* (Mechanics) 32 *रथकार* (Vehicle Designing)
33 *रतन्कार* (Gems) 34 *सुवर्णकार* (Jewellery Designing) 35 *वस्त्रकार* (Textile) 36 *कुम्भकार* (Pottery) 37 *लोहकार* (Metallurgy) 38 *तक्षक* 39 *रंगसाज* (Dying) 40 *खटवाकर* 41 *रज्जुकर* (Logistics) 42 *वास्तुकार* (Architect) 43 *पाकविद्या* (Cooking) 44 *सारथ्य* (Driving) 45 *नदी प्रबन्धक* (Water Management) 46 *सुचिकार* (Data Entry) 47 *गोशाला प्रबन्धक* (Animal Husbandry) 48 *उद्यान पाल* (Horticulture) 49 *वन पाल* (Forestry) 50 *नापित* (Paramedical)

✍️डॉ. रजनीश शुक्ल, सहायक प्रोफ़ेसर, सीएसयू भोपाल

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*📢समस्त मंत्रों की ध्वनि का गुप्त ज्ञान नही पता होगा आपको*

*🚩सनातन में हर क्रिया का एक विशेष महत्व होता है लेकिन आज सनातनियों की स्थिति विकट है उन्हें अपने धर्म का ज्ञान नहीं है…*

*👇जानिए विस्तार से और शेयर कीजिए*🙏

१. बन्धन, उच्चाटन, में ‘हूं’

२. विद्वेषण-कार्यों में ‘फट्’

३. भूत-प्रेतादि शांति में ‘हुं फट्’

४. शुभ कार्यों में ‘वषट्’

५. यज्ञादि में ‘स्वाहा’

६. पूजन-कार्यों में ‘नमः’

७. पुष्टि, पुत्रादि कार्यों में ‘स्वाहा’

८. प्रबल वशीकरण में ‘स्वधा’

६. परस्पर-विद्वेष कार्यों में ‘वषट्’

१०. आकर्षण में ‘हूं’

यदि आप किसी भी मंत्र का जाप कर रहे है इष्ट या गुरु मंत्र का आपने क्या ये मंत्र की गति अपने भीतर आभास की है ?

1. यदि बाई नासिका से श्वास चलता है, तो ‘सौम्य मंत्र जाग्रत होते हैं।

2. यदि दोनों नासिका-रन्ध्रों से श्वास चलता हो उस समय सभी मंत्र जाग्रत होते हैं।

3. जिस समय जो मंत्र जाग्रत हो, उसी का जप करने से सफलता मिलती है।

4. जिस मंत्र के अन्त में ‘स्वाहा’ शब्द का प्रयोग होता है वे ‘स्त्री संज्ञक’ मंत्र कहलाते हैं।

5. जिन मंत्रों के अन्त में ‘हुँ’ या ‘फट्’ शब्द का प्रयोग होता है उन्हें ‘पुरुष-संज्ञक’ मंत्र कहते हैं ।

6. जिन मन्त्रों के अन्त में ‘स्वाहा’ शब्द का प्रयोग होता है उन्हें ‘नपु’सक संज्ञीय’ मंत्र कहा जाता है।

7. जिन मंत्रों के अन्त में ओ३म्(Om) का प्रयोग हो उन्हें ‘आग्नेय मंत्र’ कहा जाता है।

8. पुरुष-संज्ञक मंत्रों का प्रयोग वशीकरण, अभिचार आदि कार्यों में किया जाता है।

9. स्त्री-संज्ञक मंत्र शत्रु व्याधि नाश रोग नाश कार्यों में किया जाता है।

I0. अन्य सभी कार्यों में नपुंशक-संज्ञक मंत्रों का प्रयोग होता है।

1. शांति कार्यों में नमः शब्द, स्तंभन में वषट्, वशीकरण में स्वाहा, उच्चाटन में ‘हुँ’ तथा मारण- कार्यों में ‘फट्’ शब्द का प्रयोग करना चाहिए।(यहाँ मारण का अर्थ मृत्यु देना नही अपितु रोगी शरीर को मंत्र पढ़ गंगाजल देकर मुक्ति देने से है) ये शब्द मंत्र के अन्त में लगाने चाहिए ।

2. मंत्रों की भी अलग-अलग जातियाँ हैं। एक वर्ण वाले मंत्र को ‘कर्तरी’, दो अक्षर वाले मंत्र को ‘सूची’, तीन अक्षरों वाले को ‘मुद्गर, चार को ‘मुसल’, पंचाक्षरीय मंत्र को ‘क्रूर’, पडक्षर को ‘शृंखला’, सप्ताक्षरीय मंत्र को ‘क्रकच’, अष्टाक्षर को ‘शूल’, नवाक्षर को ‘वज्र’, दशाक्षर को ‘शक्ति’, एकादशाक्षर को ‘परशु’, द्वादशाक्षर को ‘चक्र’, त्रयोदशाक्षर को ‘कुलिश’, चतुर्दशाक्षर को ‘नाराच’, पंचदशाक्षर को ‘भुशुंडी’ एवं षोडपाक्षरीय मंत्र को ‘पद्म’ के नाम से संबोधित किया जाता है।

3. अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग जाति के मंत्रजप का विधान है। मंत्र-छेदन में ‘कलंरी’, भेद-कार्यों में ‘सूचो’, मंजन कार्यों में ‘मुद्गर’, क्षोम में ‘मुसल’, बन्धनादि में ‘श्रृंखला’, छेदन-कार्यों में ‘क्रकम,’ घात-कर्म में ‘शूल’, स्तम्मन भादि सिद्धि में ‘वज्र’, बन्धन में ‘शक्ति’, विद्वेषण में ‘परशु’, सभी प्रकार के कार्यों में ‘चक्र’, उत्साद में ‘कुलिश’, मारण-कार्यों में भूषुण्डी शक्ति-कार्यों में ‘पद्म’ मंत्र का प्रयोग करना चाहिए।

4. जिस मंत्र के प्रारम्भ में नाम लिया जाता है, उसे ‘पल्लव’ मंत्र कहते हैं।

5. जिस मंत्र के अन्त में नाम लेने का विधान हो उसे ‘योजन’ मंत्र कहा जाता है ।(देवता तथा इष्ट नाम)

6. नाम के प्रारम्भ, मध्य या अन्त में मंत्र होने से उसे ‘रोध’ मंत्र कहा जाता है।

7. नाम के प्रत्येक अक्षर के पीछे जो मंत्र होता है, उसे ‘पर’ नाम की संज्ञा दी जाती है।

8. नाम के प्रारम्भ में मंत्र तथा अन्त में वही विलोम मंत्र देने से उसे ‘सम्पुट’ मंत्र कहा जाता है।(ॐ कालिके क्री क्री नमः क्री क्री कालिके ॐ) ऐसे

9. दो अक्षर मंत्र के फिर दो अक्षर नाम के इस प्रकार क्रम करने से उस मंत्र को ‘विदर्भ मंत्र’ की संज्ञा दी जाती है।

10. मंत्र के बीच में नाम ग्रथित (बांधा) होने पर उस मंत्र को “वेषण’ मंत्र कहा जाता है।

11. मारण, उच्चाटन, विद्वेषण आदि कार्यों में ‘पल्लव’ मंत्र का प्रयोग करना चाहिए ।

12. वशीकरण, शांति, मोहन आदि कार्यों में ‘योजन’ मंत्र का प्रयोग किया जाता है।

संकलनकर्ता
✍️ हनुमान भक्त प्रदीप उपाध्याय 🙏🙏