पाटलिपुत्र, बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि “चुनाव के नतीजे क्या आने वाले हैं, उसका एग्जिट पोल आना शुरू हो गया है। आप समझ लीजिए, जब ये इंडी गठबंधन वाले हर समय EVM को गाली देना शुरू कर दें, इसका मतलब है कि NDA की सफलता का एग्जिट पोल आ चुका है। 4 जून को पाटलिपुत्र में भी और देश में भी नया रिकॉर्ड बनेगा।”
लोकसभा चुनावों मे आसन्न अपरिहार्य पराजय सामने देख कांग्रेस अब बौखलाहट मे चुनाव-आयोग और चुनाव आयुक्तों पर ही छींटाकशी करने पर उतर आई है। कांग्रेस को लोकतंत्र और शुचिता की इतनी चिंता होते देख मेरी आँखें भर आई हैं कसम से। कहासुनी के लिये यूँ तो बहुत कुछ है, लेकिन यहाँ दो बातें कांग्रेस को याद दिलाना मुझे बहुत प्रासंगिक लग रहा 👉🏻
1)- कांग्रेस भारत के चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन से बहुत परेशान थी क्योंकि वे उसके इशारे पर चलने को तैयार नही थे — नॉन-निगोशियेबल और एक्चुअली “ऑटोनॉमस” अधिकारी थे जो नाक पर मक्खी भी बैठने नहीं देते थे। शेषन को गीयर मे न ले पाने से झल्लाई कांग्रेस ने फिर उन पर नकेल डालने के लिये ही एक की जगह तीन चुनाव आयुक्तों वाली प्रणाली लागू कर दी थी, याद आया? शेषन की पॉवर्स डाइल्यूट करने के लिए यह ठीक वैसा ही इंतजाम था जैसे आगे चल कर PMO की वास्तविक शक्तियाँ अपनी मुट्ठी मे रखने के लिये सोनिया गांधीने NAC (नेशनल एडवाइजरी काउंसिल) नाम की एक पैरेलल संस्था बनाई थी और खुद उसकी चीफ बन बैठी थीं। कल को यदि कांग्रेस सत्ता मे हो और उसे ऐसा अंदेशा हो जाय कि नेशनल-हेराल्ड मामले मे शहजादे को सुप्रीमकोर्ट से जेल हो सकती है, तो कांग्रेस देश मे एक की बजाय तीन या पाँच सुप्रीम कोर्ट्स का विधान भी कर सकती है — इसमे कोई संशय नही।
2)- UPA युग मे कांग्रेस ने गांधी परिवार के निकटस्थ अफसर नवीन चावला को सहायक चुनाव आयुक्त बना कर आयोग मे बिठा दिया था। और चावला की मोडस-ऑपरंडी यह थी कि वे आयोग की बैठकों के बीच मे बार-बार बाहर निकल कर “किसी” को बैठक मे चल रही गोपनीय बातों की जानकारी मोबाइल-कॉल्स पर लीक करते थे और उससे डायरेक्शन लिया करते थे। अब वह “किसी” कौन था / थी — एक बच्चा भी सहज ही अनुमान लगा सकता है। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ने स्वयं उनके इस अनैतिक आपराधिक आचरण की शिकायत राष्ट्रपति से की थी।
तो ऐसे ऑर्गनाइज्ड स्थितियों को कारित देती आई कांग्रेस जब आयोग पर उँगली उठाती है और शुचिता + लेवल-प्लेइंग-फील्ड जैसी बातें करती है, तो एक आम देशवासी की यही इच्छा होती है कि अब इस पार्टी का राजनीतिक वजूद समाप्त ही समझो।