ब्राह्मण और ब्रह्म कर्म।


हरीश मैखुरी

जाति से ब्राह्मण होना प्रारब्ध की बात है लेकिन इससे अच्छी बात है कि हम अपने पुरषार्थ से  ब्राह्मण बनें । वस्तुतः ब्राहमण जाति से अधिक एक संस्कार, आचार-व्यवहार और जीवन के परिस्कार की प्रक्रिया है, जिसे प्रत्येक मनुष्य ग्रहण कर सकता है। मनुष्य जीवन की चेतना ब्राह्मत्व को प्राप्त करने के लिए मिली है। 4:00 बजे ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान पूजा-पाठ ध्यान. गाय व कवे की रोटी। सत्य बोलो। सदाचारी रहो। मांस मदिरा अभक्ष्य नहीं खाना है। चमड़ा खाना और पहनना बंद कर दें। सिर्फ श्रेष्ठ व्यवसाय ही चुनना है, कसाईपना, दलाली, नहीं। शिखा सूत्र चंदन तिलक धारण करें। शास्त्रों (विज्ञान सम्मत सत्य) का अध्ययन और शास्त्रवत आचरण। यही है ब्राह्मत्व। अब आचार से ऐसा नेष्ठिक बनने में किसी को हर्ज क्यों होना चाहिए? शौक से ब्रह्म कर्म करके ब्राह्मण बनें, ब्राहमण रहें। जातिवाद सर्वथा और सर्वत्र गलत है, जातियां हमने खुद ही धारण कर रखी हैं, उपर से वोट बैंक की सरकारें भी जाति प्रमाण पत्र की ऐजेन्सी भर रह गई हैं। ऐसे में तो ये जातिवाद की कलंकित करने वाली व्यवस्था कभी खत्म नहीं होगी, हमें ये परिधि तोड़नी होगी। जातियों पर चिपके रहने से ब्राह्मण बनने का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। पत्रकार हो या लाचार जाति के आधार पर किसी का भी आकलन नहीं करना चाहिए, कर्म ही व्यक्ति को महान बनाता है। सोच, कर्म, और प्रदर्शन श्रेष्ठ होने चाहिए। उर्ध्व गामी होने चाहिए पतन कामी नहीं।