कार्यों को स्वेच्छा से वरण करने की स्वतंत्रता ही वर्ण व्यवस्था कही जाती है जिससे आप अपने कार्य की विशेषज्ञा धारण करते हैं

कार्यों को स्वेच्छा से वरण करने की स्वतंत्रता ही वर्ण व्यवस्था कही जाती है जिससे आप अपने कार्य की विशेषज्ञा धारण करते हैं। जन्मनात् जायते शूद्र: कर्मणात् द्विजम् उच्यते  अर्थात जन्म से प्रत्येक व्यक्ति असीम संभावना लिए शुद्ध चित वाला बालक ही होता है अपने कर्म और पुरूषार्थ से दूसरी अवस्थाओं में उच्चीकृत होता रहता है यही जीवन का आधारभूत सिद्धान्त है। 

जगद्गुरू शंकराचार्य महाभाग स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज कहते हैं आज हिन्दुओं ने आरक्षण की वैशाखी के लिए अपने पैतृक रोजगार पेशे छोड़ दिए जिन पर अब म्लेच्छ कबीलों ने आधिपत्य जमा लिया। कूट नीति का सहारा लेकर आप इतिहास को विकृत कर सकते हैं, आज संविधान की आड़ में ‘ वर्णाश्रम ‘ के प्रति विद्वेष फैलाने में तो सफल हो सकते हैं,पर…. इससे सनातनियों के पेशे अन्य सयुदायों के पास चले गये। यथा शिक्षा,रक्षा,अर्थ,सेवा,भोजन,वस्त्र,आवास, न्याय, चिकित्सा, कृषि, यातायात, उत्सत्व ,त्योहार व विवाहादि के प्रकल्प सबको समुचित रूप से समुपलब्ध हों, व एक ऐसा अर्थशास्त्र हो जिसमें जन्म से आजीविका निर्धारित हो। 

इसके लिए कोई कितना भी बड़ा अर्थशास्त्री हो या पूरा अर्थ जगत दम लगा ले,नाक रगड़ थक जाएंगे और अंततः उन्हें उलट-पुलटकर सनातन वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था का ही आश्रय लेना पड़ेगा।__पूज्यनीय जगदगुरू पुरी शंकराचार्य महाभाग