करपात्री जी महाराज : क्या आप विश्वास करेंगे कि भारत में एक ऐसे अत्यंत विद्वान तपस्वी संत भी हुए, जिन्होंने जीवनभर कभी थाली, कटोरा या किसी बर्तन में भोजन नहीं किया?
Karpatri Ji Maharaj: Would you believe that there was a very learned ascetic saint in India who never ate food in a plate, bowl or any other vessel throughout his life?
जिनकी हथेली ही उनका भोजन-पात्र थी… और जिनकी वाणी को सुनने के लिए दूर-दूर से विद्वान, संत और श्रद्धालु एकत्रित हो जाते थे।
कहा जाता है कि जब वे शास्त्रों की व्याख्या शुरू करते थे, तो घंटों तक श्रोता बिना पलक झपकाए उन्हें सुनते रहते थे। ऐसा लगता था मानो वेद, उपनिषद, पुराण और दर्शन स्वयं उनके शब्दों में सजीव हो उठे हों।
वे न तो किसी पद के पीछे भागे, न सम्मान के पीछे और न ही वैभव के आकर्षण में पड़े। उनका पूरा जीवन त्याग, तपस्या और सनातन धर्म की सेवा को समर्पित रहा।
संन्यास ग्रहण करने के बाद उनके गुरु ने उन्हें स्वामी हरिहरानंद सरस्वती नाम दिया, लेकिन दुनिया ने उन्हें एक अलग ही नाम से अमर कर दिया—”करपात्री जी महाराज”।
यह नाम उन्हें किसी उपाधि से नहीं मिला था, बल्कि उनके जीवन की सादगी ने उन्हें यह पहचान दी। वे अपनी हथेली को ही पात्र बनाकर जितनी भिक्षा मिलती, उसी से संतोषपूर्वक भोजन कर लेते थे।
यही अद्भुत तप, यही विरक्ति और यही सादगी उन्हें अपने समय के विलक्षण संतों की श्रेणी में अलग स्थान दिलाती है।
उनके जीवन का हर अध्याय यह बताता है कि सच्चा वैभव धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि ज्ञान, चरित्र और आत्मसंयम में होता है।
भारतीय ज्ञान परंपरा, वेद-वेदांत और शास्त्रों के प्रति उनका समर्पण इतना गहरा था कि आज भी अनेक लोग उन्हें बीसवीं शताब्दी के महान धर्मविदों में गिनते हैं।
लेकिन आखिर कौन थे स्वामी श्री करपात्री जी महाराज, जिनका नाम आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है?
संन्यास ग्रहण करने के बाद उनके गुरु, जगद्गुरु स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने उन्हें स्वामी हरिहरानंद सरस्वती नाम दिया। किंतु समय के साथ उनका तपस्वी जीवन ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया और पूरा देश उन्हें करपात्री जी महाराज के नाम से जानने लगा।
उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन वेद, उपनिषद, पुराण, मीमांसा, दर्शन और सनातन धर्म के गहन अध्ययन तथा प्रचार-प्रसार में समर्पित कर दिया। उनके प्रवचन केवल धार्मिक कथाएँ नहीं होते थे, बल्कि उनमें शास्त्रीय प्रमाण, गहरे तर्क और आध्यात्मिक चिंतन का अद्भुत संगम देखने को मिलता था।
चित्रकूट की तपोभूमि से उनका विशेष आत्मिक संबंध था। उन्होंने अपने कई चातुर्मास वहीं व्यतीत किए और उस पवित्र भूमि को साधना तथा धर्मचिंतन का श्रेष्ठ केंद्र माना। वे रामचरितमानस को भारतीय आध्यात्मिक साहित्य की महानतम कृतियों में से एक मानते थे और उसके संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का निरंतर प्रयास करते रहे।
त्याग उनके जीवन की सबसे बड़ी शक्ति थी। कहा जाता है कि उन्होंने कभी पद, प्रतिष्ठा या वैभव की इच्छा नहीं की। उनका मानना था कि एक संन्यासी की सबसे बड़ी पूँजी उसका ज्ञान, उसका चरित्र और उसका आत्मसंयम होता है।
गौसेवा और गौसंरक्षण के विषय में भी वे अत्यंत सक्रिय रहे। अपने सिद्धांतों के लिए उन्होंने समय-समय पर तत्कालीन सरकारों के समक्ष भी अपनी बात निर्भीकता से रखी। उनके लिए धर्म और सत्य किसी भी सत्ता से ऊपर थे।
उनके शिष्यों में अनेक प्रतिष्ठित संतों का नाम लिया जाता है। वर्तमान पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती तथा पूर्व ज्योतिर्मठ शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को भी उनके प्रमुख शिष्यों में गिना जाता है।
