अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर निदेशक अकादमिक शोध और प्रशिक्षण केन्द्र उत्तराखंड द्वारा भव्य कार्यक्रम का आयोजन : अब यह दिन वैश्विक स्तर पर महिलाओं की सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक उपलब्धियों को रेखांकित करने का बना माध्यम

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर निदेशक, अकादमिक शोध और प्रशिक्षण श्रीमती बंदना गर्बयाल के नेतृत्व में एस सी ई आर टी सभागार में समस्त विद्यालयी शिक्षा विभाग के कर्मियों द्वारा प्रतिभाग किया गया । इस अवसर पर अपर निदेशक एस सी ई आर टी श्री पद्मेन्द्र सकलानी, अपर निदेशक श्री मेहरवान सिंह रावत, व श्री के एस रावत, उप राज्य परियोजना निदेशक श्रीमती अमृता जैसवाल, सहायक निदेशक श्री के एन विजलवान सहित सभी संस्थानों के महिला तथा पुरुष कार्मिक उपस्थित रहे।
इस अवसर पर शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य करने वाली महिलाओं श्रीमती शकुंतला ह्यांकी वरिष्ठ नागरिक, श्रीमती विमला शर्मा, भोजन माता, श्रीमती रजनी कौशल आंगनवाड़ी कार्यकत्री, श्रीमती प्रेमलता बोड़ाई एव प्रतिभा पाठक श्रीमती रीना डोभाल प्र अ प्रारंभिक शिक्षा, श्रीमती संगीता राणा छात्रावास अधीक्षक, श्रीमती संगीता फारसी माध्यमिक शिक्षा पौड़ी, श्रीमती जया चौधरी प्रारंभिक शिक्षा चमोली, अनुनेहा बडोनी प्रारंभिक शिक्षा टिहरी, मंजू राज देहरादून, दीक्षिता हरिद्वार, अंजनी ITDA, रामी भट्ट समाज सेवी, सहित शिक्षा निदेशालय में कार्यरत सभी महिला कार्मिकों को सम्मानित किया गया, सभी ने निदेशक अकादमी शोध एव प्रशिक्षण श्रीमती बंदना गर्बयाल का विशेष आभार व्यक्त किया कि उनकी पहल पर यह कार्यक्रम दिव्य और भव्य बन सका, कार्य क्रम का सफल संचालन डॉ मोहन सिंह बिष्ट द्वारा किया गया।
इस अवसर पर वक्ताओं ने अपने अभिभाषण में निम्नवत् बातें साँझा की गयी-
नारी शक्ति- संघर्ष से सफलता तक के सफर में महिलाओं के संघर्ष की शुरुआत 20वीं सदी में न्यूयॉर्क की सड़कों पर उतरी उन 15,000 महिलाओं के विरोध प्रदर्शन से हुयी जिन्होंने बेहतर वेतन, काम के कम घंटों और वोट देने के अधिकार की मांग की। आज यह दिन वैश्विक स्तर पर महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उपलब्धियों को रेखांकित करने का माध्यम बन गया है।
बदलता परिवेश और नेतृत्व से आज महिलाएं घर की दहलीज पार कर अंतरिक्ष से लेकर खेल के मैदान तक अपनी छाप छोड़ रही हैं। कॉर्पोरेट बोर्डरूम हो या देश की संसद, महिलाएं अब केवल प्रतिभागी नहीं बल्कि नीति-निर्धारक (Decision Makers) बन रही हैं।
स्टार्टअप्स और उद्यमशीलता (Entrepreneurship) में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने समाज की सोच बदली है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों और व्यक्तिगत जागरूकता ने शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक अंतर को कम किया है।
लेकिन चुनौतियां अभी बाकी हैं भले ही हमने बहुत प्रगति की है, लेकिन समानता का सफर अभी अधूरा है!
सुरक्षा और रूढ़िवादिता ने समाज के कुछ हिस्सों में आज भी महिलाओं की सुरक्षा और उनके प्रति पुरानी मानसिकता आज भी एक बड़ी बाधा बनी हुयी है।
दोहरी जिम्मेदारी निभाती महिलायें ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ के नाम पर अक्सर घर और दफ्तर की दोहरी चक्की में पिस रही हैं अमल करने वाली बात यह है कि महिला दिवस का सही अर्थ तब सिद्ध होगा जब हम महिलाओं को केवल एक दिन के लिए नहीं, बल्कि हर दिन सम्मान और समान अवसर प्रदान करेंगे। यह दिन संकल्प लेने का है एक ऐसे समाज के निर्माण का जहाँ किसी की पहचान उसके लिंग (Gender) से नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और सपनों से हो।