दिल्ली में पर्दे के पीछे हुई तेजी से बदलती घटनाएँ : जिस कारण मोदी तीसरी बार बने एक पराक्रमी योद्धा

दिल्ली में पर्दे के पीछे हुई तेजी से बदलती घटनाएँ

लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद जब यह स्पष्ट हुआ कि भाजपा को केवल 240 सीटें मिलेंगी। उस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह, अमित शाह और नड्डा ने विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया कि हम विपक्ष में बैठेंगे। और गठबंधन के साथियों को फोन कर सूचित किया गया कि आप स्वतंत्र हैं अपना निर्णय लेने के लिए। इंडी अलायंस को शासन करना चाहिए। इस पर गंभीरता से विचार करने के बाद सबसे पहले चिराग पासवान और शिंदे ने कहा कि हम आपके निर्णय में शामिल हैं और हम भी विपक्ष में बैठने के लिए तैयार हैं। ध्यान दें कि मोदी पार्टी कार्यालय में दोपहर चार बजे आने वाले थे, लेकिन वे देर शाम आए, इसका कारण यही था।

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में रहने वाले मेरे एक मित्र ने यह रोमांचक और बेहद नाटकीय घटनाक्रम, जो एक आम आदमी की समझ से परे है, मुझे 5 जून को ही बताया था।

मोदी ने दोपहर में नायडू और नीतीश को फोन किया था ताकि उन्हें यह बता सकें कि आप अपना देख लो, हमें कोई आपत्ति नहीं है। मोदी के इस फैसले को सुनकर दोनों हक्के-बक्के रह गए। दोनों ही ठंडे पड़ गए क्योंकि उन्हें इंडी दलों की स्थिति का पता था। मोदी के इस निर्णय की खबर इंडी दलों को भी पहुंचाई गई।

खडगे, जयराम रमेश को तो झटका ही लग गया क्योंकि वे मानसिक रूप से सरकार बनाने की स्थिति का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे। फिर भी उन्होंने यह खबर बाहर न आने देते हुए केवल शरद पवार को नीतीश और नायडू से बात करने के लिए कहा। उनकी विनती पर पवार ने नीतीश को फोन किया।

नीतीश ने शरद पवार से पूछा कि आपको कैसे पता चला कि मोदी विपक्ष में बैठने को तैयार हो गए हैं? शरद पवार ने नीतीश से कहा कि मुझे यह नहीं पता है। मुझे केवल आपके संपर्क में रहने के लिए कहा गया है। तब नीतीश जी ने शरद पवार को सब कुछ बताया, और यह भी पूछा कि सभी के खाते में 8500 रुपये देने होंगे और संपत्ति का वितरण पिछड़े वर्ग के लोगों को करना होगा, यह दो बड़े वादे कांग्रेस ने लोगों से किए हैं। जो सबसे पहले गले में फंसने वाली हड्डी बनने वाला है। और इससे से महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री कौन होगा? यह सुनकर पवार को समझ आया कि उन्हें अंधेरे में रखा गया है। उन्होंने सबसे पहले अखिलेश यादव को फोन किया और बताया कि भाई, ऐसा हुआ है और कांग्रेस हमें अंधेरे में रखकर कुछ षड्यंत्र कर रही है। इतने पर पवार ने खडगे को फोन करके नाराजगी जताई कि आपने मुझे क्यों नहीं बताया कि भाजपा विपक्ष में बैठने को तैयार है? खडगे ने पवार से कहा कि यह खबर उड़ते-उड़ते आई थी इसलिए नहीं बताया। पवार ने कहा कि पहले प्रधानमंत्री तय करें और फिर आगे बढ़ें। इसी बीच अखिलेश यादव ने भी खडगे को फोन करके कहा कि मुझसे पूछे बिना कुछ नहीं करना, नहीं तो मैं अकेला अलग बैठ जाऊंगा। यह खबर इंडी गठबंधन में फैल गई, जबकि नतीजे आ ही रहे थे, लेकिन हर जगह हड़कंप मच गया।

इंडी दलों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि प्रति व्यक्ति 8500 रुपये/माह और अमीर लोगों के पैसे लेकर उनका वितरण पिछड़े वर्ग में कैसे किया जाए, क्योंकि कांग्रेस ने जल्द से जल्द पैसे देने का वादा किया था।

पर्दे के पीछे जबरदस्त उठा-पटक चल रही थी। इंडी दलों को तो छोड़ें, नायडू और नीतीश कुमार को भी उम्मीद नहीं थी कि मोदी और शाह ऐसा निर्णय लेंगे।

नीतीश कुमार और चंद्रबाबू ने भाजपा के बड़े नेताओं से फोन पर संपर्क किया और उन्हें आश्वासन दिया कि हम भाजपा के साथ ही रहना चाहते हैं, मोदी को तुरंत सरकार बनानी चाहिए।

भाजपा की 240 सीटें और पासवान, शिंदे सहित अन्य छोटे सहयोगियों को मिलाकर संख्या 264 हो जाती थी। इतना मजबूत विपक्ष होते हुए हम इंडी गठबंधन के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि मोदी और शाह विपक्ष में बैठकर कोई भजन नहीं करने वाले थे, यह निश्चित था इंडि सरकार दुधारी तलवार गठन से पहले ही तैयार थी। 

इधर मोदी और शाह को जयंत चौधरी के माध्यम से इंडी गठबंधन के भीतर के गड़बड़ी का पता चल गया था।

उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में मुस्लिम वर्ग में यह संदेश कांग्रेस नेता खटाखट खटाखट पहले ही दे चुके थे कि कांग्रेस का सरकार बन रही है और बैंक में सभी को 8500 रुपये मिलेंगे। इस वजह से बंगलोर और लखनऊ में बैंकों में मुस्लिम महिलाओं की लंबी कतारें लग गई थीं।

इंडी गठबंधन के नेताओं के बीच सवाल खड़ा हो गया कि यदि हम सरकार बनाते हैं, तो हमें वादे के अनुसार तुरंत 100000 रुपये प्रति वर्ष देने होंगे, भले ही हम समान संपत्ति के वितरण को कुछ समय बाद करने का वादा कर सकते हैं, लेकिन यह 8500 रुपये/प्रति माह कैसे देंगे? इस तरह प्रधानमंत्री बनना मतलब सूली पर चढ़ने जैसा होगा। महिलाओं की आधी जनसंख्या को ही मानें तो प्रति महिला एक लाख रुपये के हिसाब से साठ लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष होते हैं। इधर लोग तो बैंकों में भी आना शुरू कर चुके हैं। 

इस पर यह समाधान निकला कि फिर ऐसा करें कि नीतीश और नायडू हमें, मतलब इंडी दलों को समर्थन दें, कांग्रेस भी बाहरी समर्थन दिखाएगी और सरकार में शामिल नहीं होगी। मतलब ये पैसे देने और संपत्ति के समान वितरण करने का सवाल ही नहीं उठेगा। कांग्रेस बता सकेगी कि हमारी सरकार नहीं है, हमारी बात नहीं मानी जाती, इसलिए हम सरकार में शामिल नहीं हुए। इससे कांग्रेस फिर से अपनी जनता के बीच अच्छी छवि बनाए रख सकेगी। कांग्रेस एक बार फिर चित भी मेरी पट भी मेरी का खेल खेल रही थी।

इस पर नीतीश और नायडू ने साफ कहा कि कांग्रेस का बाहरी समर्थन देने का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। उन्होंने ऐसे ही चरण सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल को बाहरी समर्थन दिया था और फिर अचानक वापस ले लिया था और इन सभी की सरकारें कुछ ही दिनों में गिर गई थीं। हम आपके साथ नहीं आएंगे, और वहां इतनी मजबूत विपक्ष होने पर मोदीजी शांत नहीं बैठेंगे। इतना ही नहीं, बिहार में भाजपा समर्थन वापस लेगी, यह अलग बात है और बिहार में तेजस्वी का मुख्यमंत्री पद का दावा पहले से ही था, जिससे नीतीश कुमार के सामने इधर कुआं उधर खाई जैसी स्थिति थी। सोचिए, नतीजे आने के दौरान कितनी तेजी से राजनीतिक घटनाक्रम पर्दे के पीछे चल रहा था। इसी वजह से नीतीश कुमार और नायडू ठंडे पड़ गए और उन्होंने मोदी और शाह से सरकार बनाने का अनुरोध किया और समर्थन देने का आश्वासन दिया।

इससे एक तरफ इंडी दलों और सभी हितधारकों को दिखा कि 8500 रुपये प्रति माह और संपत्ति का समान वितरण का उनका वादा कितना फर्जी है। साथ ही, यह दिखा कि यह आने वाले इंडी गठबंधन सरकार के लिए कैसे गले की फांस है। उसी समय मोदी द्वारा फ्री हैंड छोड़ दिए जाने पर एनडीए के दो प्रमुख घटक दल नीतीश और नायडू की बार्गेनिंग पॉवर कम होनी स्वाभाविक थी। 

नीतीश और नायडू का दिमाग दो घंटे में ठिकाने पर आ गया था, इसी बीच अमित शाह ने दूसरा बम भी फेंक दिया कि यदि हमें सरकार बनानी है तो सीसीएस यानी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी पूरी तरह भाजपा की होगी, मतलब गृह, वित्त, रक्षा और विदेश मंत्रालय हमारे पास रहेंगे। मरता क्या न करता, दोनों ने तुरंत सहमति दी। उसके बाद रात साढ़े सात बजे नरेंद्र मोदी भाजपा कार्यालय पहुंचे और उन्होंने सरकार बनाने का ऐलान किया। मोदी का भाषण कितना आत्मविश्वास से भरा था, यह आप याद करें।

इस तरह तेज राजनीतिक घटनाक्रम पर्दे के पीछे चल रहा था, जिसकी वजह से नीतीश कुमार बार-बार एनडीए की बैठक में कहते रहे कि सरकार जल्दी बनाओ और 9 जून की बजाय 8 जून को शपथ लो और हमारा टेंशन दूर करो।

इधर 5 जून और 6 जून को भी लखनऊ और बंगलोर में लोग बैंकों और कांग्रेस कार्यालयों में पैसे लेने आते रहे। 

इसीलिए शाम को इंडी गठबंधन की बैठक में यह निर्णय हुआ कि हम कोई फोड़-फोड़ न करें, नहीं तो हमें लोकक्षोभ का सामना करना पड़ेगा और बदनामी होगी और फिर जनता हम पर विश्वास नहीं करेगी। राहुल गांधी की जल्दी से 8500 रुपये वाली घोषणा ऐसी विपत्ति बन गई।

इसलिए खडगे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हम सही समय आने पर भाजपा सरकार को हराएंगे और हम कोई सरकार नहीं बनाएंगे।

10 जून को घोषित मंत्रिमंडल के बंटवारे से पूरी स्थिति पर मोदी और शाह का नियंत्रण साबित होता है।

यह अटल और आडवाणी की भाजपा नहीं है, यह ध्यान में रखते हुए हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

इसे ऑफेंसिव डिफेंस कहते हैं।

मोदी पूरी ताकत के साथ एक्शन में हैं। होना भी चाहिए देश के लिए आवश्यक भी है।

कल तक आपिए और कांग्रेसी मिल कर ट्विटर पर ऐसी अफवाहें उड़ा रहे थे कि नीतीश कुमार और चंद्राबाबू नायडू ने मूडी को समर्थन के बदले उनसे रेल मंत्रालय माँगा है, तो गृह मंत्रालय माँगा है, तो रक्षा मंत्रालय माँगा है, तो वित्त मंत्रालय माँग लिया है. . . . अब NDA नही बचेगा, सरकार गिर जाएगी. . . . चरखा निपोरा. . . . ब्ला ब्ला. . .!!!

आज जब भाजपा के अधिकांश मंत्री अपने अपने पुराने पोर्टफोलियो के साथ ही रिपीट हो गये और मंत्रालयों का बँटवारा निर्विघ्न संपन्न हो गया, तो संजय सिंह खीसें निपोर रहा है कि — न गृह, न रक्षा, न वित्त, न विदेश, न वाणिज्य. न सड़क, न रेल, न शिक्षा, न स्वास्थ्य. न कृषि, न जलशक्ति. न पेट्रोलियम, न दूरसंचार. . . . NDA के घटक दलों के हिस्से केवल “झुनझुना मंत्रालय” आया है। तेजस्वी बाबू भी ऐसा ही दुखड़ा रोते देखे गये कि “बिहार के सपोर्ट से सरकार बना है, लेकिन बिहारी लोगों को कोई ठीकठाक मंत्रालय नही दिया”।

भाई, सरकार नरिंदर मूडी हेड कर रहे हैं। घटक दलों को कैसे किस बात पर साधना है यह मूडी और भाजपा का टेंशन है। फिर तुम लोग काहे इतनी मगजमारी कर रहे कि किसे क्या मिला??? दरअसल आपियों के साथ साथ कांग्रेसी और लालटेन परिवार का फोकस मुख्यतः केंद्रीय गृह और वित्त मंत्रालय पर था क्योंकि ED से लेकर CBI तक — सभी प्रमुख जाँच एजेंसियाँ गृहमंत्री को और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट वित्तमंत्री को रिपोर्ट करते हैं। इन लोगों ने सोचा था कि यदि नीतीश कुमार या चंद्राबाबू गृह और वित्त मंत्रालय हथिया लेते हैं तो उनसे अपने पुराने संबंधों की दुहाई देकर आसानी से यह डील की जा सकेगी वे इनके खिलाफ चल रही तमाम तरह की जाँचों की रफ्तार स्लो कर दें, बल्कि इन एजेंसियों की नकेल कस कर जाँचों को पटरी से उतार दें और इन सबको क्लीनचिट ही मिल जाये। लेकिन मूडी ने गृह, रक्षा, वित्त जैसे सभी प्रमुख मंत्रालय उन्ही मंत्रियों को फिर से देकर यह साफ कर दिया है कि जिसकी जैसी कुटाई चल रही थी — वैसी ही जारी रहेगी। गोडाउन भीतर से बंद कर चाभी पीटर ने नहीं – स्वयं विजय ने जेब मे रख ली है, और किसी को भी बच निकलने का कोई अवसर नही मिलने जा रहा।

अब अगले 5 साल की सोचने भर से फट के फ्लॉवर हो गयी है — तिहाड़ की रोटी के बारे मे कल्पना करके अभी से दस्त लग गये हैं  भ्रष्ट लुटेरों को। ✍️