1947 से पूर्व भारत में राजे-रजवाड़ों का बोलबाला था. कई जगह जनता को अंग्रेजों के साथ उन राजाओं के अत्याचार भी सहने पड़ते थे. श्रीदेव
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पलायन रोकने हेतु तेजी से मोटर सड़कों का निर्माण विस्तार और भांग खेती सहायक —-हरीश मैखुरी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बंजर पडे़ ये
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कलश जनजाति दुनियां के भविष्य पर मंडराते खतरे का आखिरी सबूत तो नहीं बनेगी? – संजीव कुमार दुबे की कलम से एक जगह ले के
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क्या वो नशे में था …….. सतीश लखेड़ा उसका मन और शरीर एक साथ व्यवहार नहीं कर रहा था। वह बार-बार एक ही पंक्ति को
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” जब कोई चीज मुफ्त में मिल रही है तो समझ लीजिए आपको अपनी स्वतंत्रता दे कर इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी ! डेसमंड टूटू ने
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