#संस्कृत निश्चित रूप से #अत्यंत प्राचीन है। भारत ही नहीं ब्रहमांड की भाषा है। देवभाषा है। अइ उण ऋृ लृ” जो कि #महेश्वर_सूत्रों (संस्कृत #व्याकरण के आधार) के आरंभिक स्वर हैं। यह श्रुती स्मृति परम्परा के रूप में करोड़ों वर्ष से विद्यमान रही है। https://www.facebook.com/share/v/1DbaVuRi8D/
हमारे पास तो #चार_वेद
(#ऋग्वेद, #यजुर्वेद, #सामवेद और #अथर्ववेद), एक सौ आठ #उपनिषद, अट्ठारह #पुराण, छ #दर्शनशास्त्र, #ज्योतिष_विद्या, #सिद्धांत_कौमुदी, #मनुस्मृति #याज्ञवल्क्य स्मृति, #पराशर_स्मृति, #अत्रि_स्मृति, #विष्णु स्मृति, #हारीत_स्मृति #भाष्य, #व्याकरण, #रामायण #महाभारत और #गीता जैसे प्रमाण हैं। इनका अपना करोड़ों वर्ष का इतिहास, व्याकरण और भाषा विज्ञान है। ओष्ठ, दंति तालु नासिका कंठ शब्दावली और हृश्व दीर्ध व प्लुत स्वर हैं।
हमें किसी आंग्ल या उर्दफारसी जैसे असंस्कृत असंस्कारी कबीलों की पुस्तकों के उदहारण से सनातन धर्म संस्कृति और इसके #धर्म_शास्त्रों व #भाषा को प्रमाणित करने की #आवश्यकता ही #नहीं है।
#ब्राह्मी, #प्राकृत, #पाली लिपि से भी पहले #देवनागरी बोली व लिपि विद्यमान थी। #संस्कृत को #जटिल व कठिन कहना भी #अज्ञानता है। जैसे उर्दू और अंग्रेजी पंजाबी तमिल यदि हम नहीं जानें तो वो कठिन ही लगेगी, ठीक वैसे ही संस्कृत करोड़ों वर्ष देव और वैदिक सभ्यताओं की प्राचीन मनुष्य सभ्यता की बोलचाल की भाषा ही रही है। वो तो दुर्दांत #मुगल आक्रांता, #अंग्रेज लुटेरों और मुस्लिम लीग कांग्रेस के राज में भारत के पांच केंद्रीय शिक्षा मंत्री यथा मौलाना आज़ाद हुमायूँ कबीर, मोहम्मद करीम छागला, फखरुद्दीन, अली अहमद, नुरुल हसन
लगाये, इसीलिए न केवल अकबर, बाबर, औरंगजेब, खिलजी जैसे दुर्दांत म्लेच्छ आक्रान्ता महान बताये गये, अपितु गुरूकुल और संस्कृत शिक्षा मिटाने और उर्दू व आंग्ल जैसी विदेशी अपशब्द मय असभ्य भाषा भारत बढाने के कुत्सित प्रयास हुए इससे हमें अपनी ही देव भाषा, मातृभाषा #संस्कृत अब #कठिन लगने लगी है।
अन्यथा अरबी कबीले और वैटिकन यूरोपीय कबीले जब गुफाओं में कच्चा मांस चबा कर जीवन बचाते थे तब भी अखंड भारत में #नालंदा विश्वविद्यालय #तक्षशिला विश्वविद्यालय #विक्रमशिला विश्वविद्यालय #शारदा_विश्विद्यालय जैसे दर्जनों अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय और आठ लाख गुरूकुल संचालित थे।
फिर भी #मैक्समूलर आदि को अपना #मानसिक_अब्बा मानने वाले बामपंथी सैक्यूलरों या हलाला प्रोडक्टों का प्रयास रहता है कि भारतीय संस्कृति, भारतीय परम्परा, भारतीय भाषा को हेय बता कर तिरोहित किया जाय।
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उसी में भाषा साहित्य #जिहाद एक बड़ा षड्यंत्र है, इसमें भारत की संसद संविधान व न्याय व्यवस्था भी भारतीय संस्कृति विरोध में कहीं न कहीं आज भी सहयोगी हैं। ✍️ हरीश मैखुरी
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