बदरीनाथ में संगीत नहीं, मर्यादा का प्रश्न : तीर्थ यात्रा और पर्यटन का भेद भी समझना होगा – डाॅ0 रमेश पांडे

बदरीनाथ में संगीत नहीं, मर्यादा का प्रश्न

बदरीनाथ धाम से जुड़े वर्तमान विवाद को केवल डीजे, गीत, नृत्य अथवा किसी एक कलाकार के कार्यक्रम तक सीमित करके देखना विषय की गंभीरता को कम करना होगा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 19 और 20 सितंबर 2026 को बदरीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में ‘देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव’ आयोजित हुआ, जिसमें लोक कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। बाद में तेज संगीत और नृत्य से संबंधित वीडियो सामने आने के बाद बदरीनाथ धाम की धार्मिक मर्यादा तथा ऐसे आयोजनों के स्वरूप को लेकर प्रश्न उठे।

बदरीनाथ केवल हिमालय में स्थित पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सनातन परंपरा में भगवान बदरीविशाल की उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ है। इसलिए वहां होने वाले किसी भी आयोजन को केवल मनोरंजन अथवा पर्यटन की दृष्टि से नहीं, बल्कि उस स्थान की आध्यात्मिक चेतना, धार्मिक परंपरा और तीर्थ-मर्यादा के संदर्भ में देखना आवश्यक है।

भारतीय परंपरा में संगीत को कभी केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना गया। सामवेद से लेकर मंदिरों की स्तुति, भजन, कीर्तन, स्तोत्र और लोकदेवताओं की उपासना तक संगीत ईश्वराराधना का माध्यम रहा है। इसलिए मूल प्रश्न यह नहीं है कि बदरीनाथ में संगीत होना चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि बदरीनाथ जैसे तीर्थ में संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम का स्वरूप कैसा होना चाहिए।

यही इस पूरे विवाद का मूल बिंदु है।

तीर्थ और पर्यटन में अंतर

आधुनिक पर्यटन किसी स्थान को उसके प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक विरासत और मनोरंजन की संभावनाओं के आधार पर देखता है। तीर्थ की अवधारणा इससे अलग है। पर्यटन में व्यक्ति किसी स्थान को देखने जाता है, जबकि तीर्थ में वह अपने भीतर देखने और आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करने जाता है।

बदरीनाथ की यात्रा केवल हिमालय की सुंदरता देखने के लिए नहीं होती। श्रद्धालु भगवान बदरीविशाल के दर्शन, पूजा, साधना, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक शांति के लिए वहां पहुंचता है। इसलिए मंदिर के आसपास होने वाले कार्यक्रमों में इस मूल अंतर का ध्यान रखा जाना चाहिए।

यदि किसी आयोजन का ध्वनि-स्तर और स्वरूप इतना तीव्र हो जाए कि वह जप, पूजा, साधना अथवा तीर्थ की शांति से टकराने लगे, तो आयोजन की उपयुक्तता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

लोक संस्कृति का संरक्षण भी आवश्यक

उत्तराखंड की लोक संस्कृति अत्यंत समृद्ध है। जागर, मांगलिक गीत, देव स्तुति, पांडव नृत्य, ढोल-दमाऊं और अनेक लोक परंपराएं पहाड़ के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन का अभिन्न अंग हैं। इसलिए लोक कलाकारों को मंच देना और स्थानीय संस्कृति को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।

लेकिन लोक संस्कृति और आधुनिक मंचीय मनोरंजन को एक ही मान लेना उचित नहीं होगा। लोक संस्कृति का संरक्षण तभी सार्थक है, जब उसके मूल संस्कार, संदर्भ और मर्यादा भी सुरक्षित रहें।

किसी कलाकार की प्रतिभा और किसी विशेष स्थान पर कार्यक्रम के स्वरूप—ये दो अलग विषय हैं। इसलिए इस विवाद में किसी कलाकार को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने के बजाय आयोजन की अवधारणा, स्थान, ध्वनि-स्तर, प्रस्तुति की शैली और अनुमति की प्रक्रिया पर चर्चा अधिक सार्थक होगी।

गलती कलाकार की या आयोजकों की?

बदरीनाथ में हुए कार्यक्रम को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि यदि कार्यक्रम की अनुमति, स्थान, समय, मंच और ध्वनि व्यवस्था आयोजकों तथा संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था के अधीन थी, तो केवल मंच पर प्रस्तुति देने वाले कलाकार को ही विवाद का केंद्र क्यों बनाया जाए?

कलाकार अपनी निर्धारित प्रस्तुति देता है। लेकिन कार्यक्रम का स्वरूप क्या होगा, कहां होगा, किस समय होगा, ध्वनि की सीमा क्या होगी और तीर्थ की धार्मिक गतिविधियों पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा—इन विषयों की जिम्मेदारी व्यापक आयोजन व्यवस्था से जुड़ी होती है।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि कलाकार ने क्या प्रस्तुत किया, अपितु यह भी पूछा जाना चाहिए कि आयोजन की रूपरेखा किसने तय की और क्या उसे तीर्थ की मर्यादा के अनुरूप बनाया गया था?

यदि किसी प्रस्तुति पर आपत्ति है तो उस पर तथ्यपरक चर्चा हो सकती है, लेकिन किसी एक कलाकार को पूरी घटना के लिए जिम्मेदार ठहराने से पहले आयोजन की संपूर्ण संरचना और जिम्मेदार पक्षों को देखना आवश्यक है।

बदरीनाथ की अपनी ध्वनि-संस्कृति है

धामों का अपना आध्यात्मिक वातावरण होता है। घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चार, वेदपाठ, स्तोत्र, आरती, शंख और हिमालय की प्राकृतिक नीरवता मिलकर तीर्थ की विशिष्ट अनुभूति निर्मित करते हैं।

बदरीनाथ जैसे उच्च हिमालयी तीर्थ में यह वातावरण स्वयं साधना का माध्यम बन जाता है। इसलिए वहां ध्वनि को केवल मनोरंजन या तकनीकी व्यवस्था का विषय नहीं माना जा सकता।

तीर्थ पुरोहितों और संतों की ओर से कार्यक्रम के स्वरूप तथा तेज ध्वनि को लेकर आपत्तियां सामने आई हैं। दूसरी ओर, आयोजन की अनुमति और प्रशासनिक जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग दावे भी सामने आए हैं। ऐसी स्थिति में आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर तथ्य और व्यवस्था पर चर्चा करना आवश्यक है।

समाधान क्या हो?

धार्मिकता का अर्थ संस्कृति-विरोध या आधुनिकता-विरोध नहीं है। सनातन परंपरा ने कला, संगीत, नृत्य और साहित्य को सदैव सम्मान दिया है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब स्थान की प्रकृति और कार्यक्रम की प्रकृति के बीच संतुलन समाप्त हो जाता है।

बदरीनाथ में लोकसंगीत हो सकता है, स्थानीय कलाकारों को अवसर भी मिल सकता है, लेकिन कार्यक्रम का स्वरूप तीर्थ की आध्यात्मिक गरिमा के अनुकूल होना चाहिए।

चारधाम तथा अन्य प्रमुख तीर्थस्थलों के आसपास होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाने चाहिए। कार्यक्रम के स्थान, समय, ध्वनि की तीव्रता, मंचीय प्रस्तुति और धार्मिक गतिविधियों पर उसके प्रभाव का पूर्व आकलन हो। मंदिर प्रबंधन, तीर्थ पुरोहितों, संत समाज, स्थानीय समुदाय, प्रशासन और सांस्कृतिक विशेषज्ञों के बीच समन्वय से ऐसे कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की जाए।

इससे लोक संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी और तीर्थ की मर्यादा भी।

बदरीनाथ का प्रश्न किसी एक गायिका, किसी एक गीत या किसी एक महोत्सव का प्रश्न नहीं है। यह उस व्यापक दृष्टि का प्रश्न है, जिसके आधार पर हम देवभूमि के तीर्थों को देखते हैं।

लोक संस्कृति का संरक्षण आवश्यक है। कलाकारों का सम्मान आवश्यक है। आयोजन की जवाबदेही भी आवश्यक है। लेकिन तीर्थ की मर्यादा सर्वोपरि है।

बदरीनाथ में संगीत हो, संस्कृति हो, लोकजीवन हो—लेकिन सब कुछ भगवान बदरीविशाल की आध्यात्मिक उपस्थिति और तीर्थ की गरिमा के अनुरूप हो।

यही देवभूमि की वास्तविक पहचान और हमारी सामूहिक दायित्व है।