मोदी जी को शायद अब प्रधानमंत्री से ज्यादा “आंबेडकर बनने” की जल्दी दिखाई दे रही है।
अमित शाह जी भी शायद देश की राजनीति का नया सामाजिक गणित लिखने में व्यस्त हैं।
पिछड़े और दलित वोटों को साधने की कोशिश में भाजपा के पुराने सवर्ण वोटर कहीं पीछे छूटते नजर आ रहे हैं।
जिन्होंने वर्षों तक कमल को मजबूत किया, अब उन्हीं से कहा जा रहा है—थोड़ा और इंतजार कीजिए!
कभी-कभी लगता है कि भाजपा को अपने पारंपरिक वोटर की नाराजगी दिखाई ही नहीं देती।
यूजीसी जैसे मुद्दों ने इस नाराजगी को और हवा देने का काम किया है।
दिलचस्प बात यह है कि लोग योगी आदित्यनाथ से उतने नाराज नहीं, जितनी शिकायत दिल्ली के दरबार से है।
राजनीति में इतिहास खुद को दोहराता है—बस किरदार और पार्टी बदल जाती है।
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल की राजनीति से सत्ता का समीकरण बदला था।
लेकिन राजनीति का इतिहास यह भी बताता है कि सामाजिक समीकरण बिगड़ जाए तो सत्ता का सिंहासन ज्यादा दिन सुरक्षित नहीं रहता।
आज भाजपा के सामने भी सवाल वही है—वोट बैंक बढ़ाते-बढ़ाते कहीं अपना पुराना वोट बैंक ही न घट जाए!
क्योंकि चुनाव केवल नए वोट जोड़ने से नहीं, पुराने वोट बचाने से भी जीते जाते हैं।
सवर्ण समाज को लगातार नजरअंदाज करना भाजपा के लिए आत्मघाती रणनीति साबित हो सकती है।
मोदी जी को विश्वनाथ प्रताप सिंह बनने की कोशिश से पहले शायद उनके राजनीतिक परिणाम भी याद कर लेने चाहिए।
क्योंकि जनता लोकतंत्र में बहुत कुछ सहती है, लेकिन चुनाव के दिन अपना हिसाब जरूर करती है।
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