रहस्यमयी हिमालय: रूपकुंड की ‘कंकाल झील’ और भूमध्यसागरीय DNA का अनसुलझा सच

रहस्यमयी हिमालय: रूपकुंड की ‘कंकाल झील’ और भूमध्यसागरीय DNA का अनसुलझा सच –

हिमालय की गोद में अनेक रहस्य छिपे हुए हैं, लेकिन उत्तराखंड के चमोली जिले के विकास खंड – देवाल में स्थित रूपकुंड झील (जिसे दुनिया ‘कंकाल झील’ / Skeleton Lake के नाम से जानती है) इतिहास, पुरातत्व और विज्ञान का सबसे बड़ा रहस्य बनी हुई है।

समुद्र तल से लगभग 16,500 फीट (5,000 मीटर) की अत्यधिक ऊँचाई पर स्थित यह झील साल के अधिकांश महीनों में बर्फ की मोटी चादर से ढकी रहती है। लेकिन जैसे ही ग्रीष्मकाल में बर्फ पिघलना शुरू होती है, तो झील के तली से लेकर आसपास की ऊंची चट्टानों की दरारों, पत्थरों के मलबे और ढलानों पर सैकड़ों मानव कंकाल दिखाई देने लगते हैं।

रूपकुंड का भूगोल कुछ ऐसा है कि वहाँ कंकाल केवल पानी में ही नहीं, बल्कि ऊंचे पहाड़ों की चट्टानी दरारों और पत्थरों के मलबे में भी दबे मिले हैं। बर्फीली और अत्यधिक ठंडी हवाओं के कारण कई कंकाल और बाल आंशिक रूप से सुरक्षित अवस्था में पाए जाते हैं।

स्थानीय मान्यता: नंदा देवी राजजात की पौराणिक कथा-

गढ़वाल की समृद्ध लोककथाओं और मान्यताओं में इन कंकालों का सीधा संबंध उत्तराखंड की सबसे पवित्र ‘नंदा देवी राजजात यात्रा’ से जोड़ा जाता है।

कहा जाता है कि इस दुर्गम और धार्मिक यात्रा के कड़े नियमों का उल्लंघन करने (जैसे यात्रा में ढोल-नगाड़े बजाना और नर्तकियों का नृत्य कराना) के कारण माँ नंदा देवी रुष्ट हो गईं। जब यह दल रूपकुंड के पास पहुँचा, तो अचानक आसमान से विशालकाय ओलों की भयंकर बारिश (Storm of Iron Balls) हुई। छिपने की कोई जगह न मिलने के कारण पूरा का पूरा दल वहीं हिमपात और ओलावृष्टि की चपेट में आकर मारा गया।

वैज्ञानिक शोध और DNA का चौंकाने वाला खुलासा-

दशकों तक ये कंकाल अलग अलग मान्यताओं के केंद्र रहे। लेकिन वर्ष 2019 में अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं, भारत के CCMB (हैदराबाद) और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा 38 कंकालों के उच्च-स्तरीय DNA और रेडियोकार्बन डेटिंग अध्ययन ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया।

वैज्ञानिक अध्ययन से तीन प्रमुख और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:

* एक नहीं, दो अलग-अलग कालखंड: यहाँ पाए गए कंकाल किसी एक दुर्घटना या एक ही दौर के नहीं हैं। इनमें लगभग 1,000 वर्षों का अंतर है।

* पहला समूह (भारतीय मूल – 800-900 ईस्वी): कंकालों का मुख्य और बड़ा हिस्सा लगभग 1,200 वर्ष पुराना (9वीं शताब्दी) है। आनुवंशिक रूप से ये भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों (उत्तर और दक्षिण भारत) के लोग थे, जो संभवतः नंदा देवी तीर्थयात्रा के लिए निकले थे।

* दूसरा समूह (भूमध्यसागरीय सभ्यता – 1800 ईस्वी): सबसे रहस्यमयी खोज यह थी कि कंकालों का एक छोटा समूह 19वीं सदी की शुरुआत (आज से लगभग 200–230 साल पहले) का है। इनके DNA विश्लेषण से पता चला कि वे ग्रीस (Greece) और क्रीट द्वीप (Mediterranean Region) के लोगों से मेल खाते हैं! इसके अलावा एक नमूना दक्षिण-पूर्व एशियाई मूल का भी पाया गया।

मौत का कारण: सिर पर भारी प्रहार

फॉरेंसिक विशेषज्ञों द्वारा खोपड़ियों और कंधों की हड्डियों की जाँच में पाया गया कि अधिकांश मौतों का कारण ऊपर से हुए भारी प्रहार से सिर पर लगे फ्रैक्चर थे। हड्डियों पर घाव के निशान किसी धारदार हथियार के नहीं थे, बल्कि गोल, भारी गोलों (जैसे क्रिकेट बॉल के आकार के बड़े ओले) के प्रहार से बने थे। यह वैज्ञानिक निष्कर्ष स्थानीय लोककथा की ओलावृष्टि वाली कहानी से बहुत हद तक मेल खाता है।

एक अनसुलझा सवाल-

19वीं सदी की शुरुआत में यूरोप और भूमध्यसागरीय (Greek) क्षेत्र के लोग भारत के इतने दुर्गम लगभग , 16,000 फीट ऊंचे बर्फीले दर्रे पर क्या कर रहे थे? क्या वे सिल्क रूट से भटके हुए व्यापारी थे, खोजकर्ता थे या किसी अज्ञात मिशन पर निकले यात्री? इसका कोई ठोस लिखित ऐतिहासिक दस्तावेज़ आज भी उपलब्ध नहीं है।

हिमालय की यह झील आज भी अपने भीतर कुदरत के प्रकोप, भारत की प्राचीन धार्मिक परंपराओं और महाद्वीपों के पार से आए अनजान मुसाफिरों की एक बेहद रहस्यमयी दास्तान छिपाए बैठी है।

चित्र – साभार दीवान सिंह पिमोली

स्थानीय निवासी- देवाल