#बाबामोहन_उत्तराखंडी ने नारायण दत्त तिवारी सरकार के समय उत्तराखंड की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनाने के लिए पहले ४३ दिन और उसके बाद ३८ दिन बेनीताल में आमरण अनशन किया। ३८ दिनों के उपरांत प्रशासन उन्हें निर्ममता पूर्वक उठा कर कर्णप्रयाग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लाया जहां उन्होंने प्राण त्याग दिए। तब से अब तक कांग्रेस और भाजपा की सरकारें आयी गयी यूकेडी के विधायक भी सरकारों में रहे पर स्थाई राजधानी गैरसैंण का विषय #ठंडेबस्ते में #डाल दिया गया। और अब तो देहरादून के रायपुर में राजधानी भवन निर्माण की चर्चा भी शोशल मीडिया मे तैर रही है। तो क्या बाबा मोहन उत्तराखंडी का बलिदान व्यर्थ चले गया? Did Baba Mohan Uttarakhandi’s sacrifice after 43 days of fast unto death for permanent capital Gairsain go in vain?
बाबा मोहन उत्तराखंडी का जन्म बिठौली गांव १९४८ में पौड़ी जनपद के एकेश्वर ब्लाक में हुआ उनके पिता मनवर सिंह था वे अपने पिता के माजिले पुत्र थे।
इंटर के बाद आईआईटी कर बंगाल इंजीनियरिंग में भर्ती हुए, लेकिन सरकार की नौकरी उन्हें जमी नहीं आई। १९९३ में राज्य आंदोलन में आ गए २अक्टूबर ९४ के रामपुर तिराहा कांड से व्यथित होकर आजीवन दाढ़ी नहीं काटने का संकल्प लिया। इसके बाद वो बाबा मोहन उत्तराखंडी के नाम से पहचाने जाने लगे। बेनीताल अनशन के ३७ वें दिन ८अगस्त को कर्णप्रयाग तहसील के तत्कालीन एसडीएम जगदीश लाल व राजस्व उपनिरीक्षक जयकृत सिंह जी भारी दल-बल के साथ बेनीताल पहुचे। आरोप है कि वहां बाबा को घंटों प्रताड़ित किया गया। शाम ८ बजे बाबा को घसीटते हुए मोटर सड़क तक लाया गया। बेहोशी की स्थिति में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कर्णप्रयाग में भर्ती कराया गया। वहां रात ११ बजे बाबा ने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। बाबा के सहयोगी आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि इस बीच पूरे रास्ते भर बाबा को निर्ममता से पीटा गया, जिससे बाबा की मृत्यु हुई हालांकि प्रशासन ने बाबा की मौत का कारण हृदय गति रुकना बता कर प्रकरण को शांत करा दिया। बाबा मोहन उत्तराखंडी का योगदान जिसे उत्तराखंड की सरकारें भूल गयी
✍️ ९ फरवरी से ५ मार्च २००१ नंदाठोकी गैरसैण में भूख हड़ताल।
✍️ २ जुलाई से ४अगस्त २००१ नंदाठोकी गैरसैण में भूख हड़ताल।
✍️ १३ दिसंबर से १० फरवरी २००२ धारकोट पौड़ी में भूख हड़ताल।
✍️ २ अगस्त से २३ अगस्त २००३ कौनपुर गढ़ थराली में भूख हड़ताल।
✍️ २ फरवरी से २१ फरवरी २००४ कोदियाबगड़ पौड़ी में भूख हड़ताल।
✍️ २ जुलाई से ८ अगस्त २००४ बेनीताल गैरसैण में भूख हड़ताल।
बेनीताल शहादत मेला के सचिव वीरेंद्र मिंगवाल ने बताया कि ८ अगस्त २००४ मध्यरात्रि में बाबा की सन्देहास्पद मृत्यु को लेकर वर्ष भर कई प्रदर्शन व आंदोलन हुए, किंतु प्रशासन मौन साधे रहा। उन्होंने कहा कि बाबा मोहन उत्तराखंडी की मौत की हमारे द्वारा सीबीआई जांच की मांग की गई थी, किंतु जांच तो छोड़िये सरकार ब्यूरोक्रेट्स को बचाने में लगी रही। मिंगवाल ने कहा कि सरकार द्वारा कई घोषणाएं की गई जो आज तक धरातल पर नहीं उतर पाई हैं। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा बेनीताल को एस्ट्रो विलेज के रूप में विकसित किया जा रहा है जो सराहनीय पहल है। उन्होंने सरकार से बाबा मोहन उत्तराखंडी की याद में बेनीताल में स्मारक बनाये जाने की मांग की है। और #गैरसैंण (भराड़ीसेंण) तो उत्तराखंड राज्य की स्थाई राजधानी समूचे राज्य भर के लोगों की प्राथमिकता है ही। अब वर्ष २००५ से हर वर्ष ९ नंवबर को #बेनीताल शहादत मेले में हजारों उत्तराखंडी बाबा मोहन को श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।✍️ हरीश मैखुरी

