क्या मणिपुर के उग्र आन्दोलन केन्द्र की पूर्ववर्ती कांग्रेस या वर्तमान भाजपा सरकारों की गलती है जिन्होंने वहां के मूल निवासी मैतैई समाज की अनदेखी की! या इसके पीछे बर्मा के घुसपैठिये हैं जो सुविधायें मणिपुर से लेकर हथियारों के बल पर वहां मालिक बन बैठे?

मणिपुर के उग्र आन्दोलनों का केन्द्र की पूर्ववर्ती कांग्रेस या वर्तमान भाजपा सरकारों की गलती है जिन्होंने वहां के मूल निवासी मैतैई समाज की अनदेखी की! या इसके पीछे बर्मा के वे घुसपैठिये हैं जो सुविधायें लेकर मालिक बन बैठे?

मणिपुर के लिए केवल भाजपा या कांग्रेस बलैम करने वाले जानते है कि मणिपुर की असली प्रॉब्लम तो किसी को पता होगी नहीं, हम जिसका प्रचार कर देंगे वहीं सच बन जाएगा!! 

लेकिन रियलिटी ये है कि मणिपुर का जलना निश्चित और जरूरी था, आपको ये लाइन गलत लग सकती है लेकिन पहले ये समझिए कि मणिपुर में हो क्या रहा है

मणिपुर में जो खुद को मूल निवासी मानते है वे मैतेई समाज है जिनको OBC में रखा गया है, वहीं नागा ट्राइब जो नागालैंड में अधिकता में है, वहीं कुकी जो अधिकतर बर्मा में रहते थे उन्होंने आदिवासी का दर्जा पा लिया 

मणिपुर में कानून बनाया गया कि मणिपुर की जो 90% पहाड़ी भूमि है उसमें केवल नागा और कुकी ही रहेंगे, बचा 10% एरिया मैतेई का रहेगा लेकिन नागा और कुकी यहां आकर रह सकते है कोई रोक नहीं है

दूसरा आदिवासी होने के कारण आरक्षण का बड़ा सीधा लाभ इन्हें मिलता है, ये मिलकर 40% हो जाते है, जिससे मैतेई का ज्यादा कुछ बचता नहीं है, सरकारी पदों और शिक्षा, रोजगार के हिस्सों में भी मैतेई लोगों को कम अवसर मिलने लगे

पहले दोनों ट्राइब की आबादी कम थी, तो मैतेई लोगों को फर्क नहीं पड़ता था, वे सोचते थे इससे पहाड़ के जो गरीब आदिवासी भाई लोग है उनका भला होगा, लेकिन अब स्थिति उलट है

इनका कहना है कि एक तो तुम लोग हमे अपने इलाकों में घुसने नहीं देते, दूसरा हमारे इलाकों में तुम जबरन घुसते जा रहे हो

इस बात की गंभीरता को समझे कि ये लोग मैदानी हिस्सों में भी इतनी संख्या बना चुके है कि आपने मैतेई लोगों के गांव के गांव जलने की खबर सुनी ही होगी, मतलब अब 10% एरिया भी इनके लिए सुरक्षित नहीं रहा है

इसलिए इन्होंने भी डिमांड की कि इन्हें भी आदिवासी का दर्जा दिया जाए, जिससे सब इक्वल हो जाए, लेकिन ये कुकी और नागा को लग गया बुरा

नागा तो कम लेकिन कुकी जो बर्मा से हथियार तस्करी करते थे, इनके पास एडवांस वेपन है इन लोगों ने छात्र आंदोलन कर नाम पर पूरे स्टेट में दंगा शुरू कर दिया

सिंपैथी के लिए दिल्ली में भी प्रोटेस्ट करने पहुंच गए, भले इनके आतंकी ग्रुप मैतेई को मार रहे आर्मी को मार रहे लेकिन विक्टिम कार्ड खेलना इनको अच्छे से आता है, अभी कुछ यूक्रेनी भी इसी बॉर्डर से कुछ दूर बर्मा में मिले थे 

यहां दोनों समुदाय के हित आपस में टकरा रहे है, मैतेई के लिए ये अस्तित्व का सवाल है तो वहीं कुकी के लिए पावर और प्रभाव का है

दोनों इसे नहीं छोड़ेंगे

कोई भी समझौता दोनों पक्षों को लंबे समय के लिए नुकसान करेगा, इसलिए भारत सरकार की बात बन नहीं रही है क्योंकि बीच का रास्ता कुछ है ही नहीं क्योंकि कुकी और नागा को जो पावर संविधान से दी गई है वो मैतेई के अस्तित्व को खत्म करने के लिए पर्याप्त है