लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ उत्तराखंड के हल्द्वानी में एससी/एसटी एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज किया गया है।भारत की संसद में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर #एससीएसटी एक्ट के अन्तर्गत हल्द्वानी थाने में पंजीकृत मुकदमें में राहुल गांधी गिरफ्तार होते हैं तो उनकी राजनीतिक परेशानी बढ़नी निश्चित रूप से तय है। और यदि उनकी गिरफ्तारी नहीं होती या उन्हें अग्रिम जमानत मिल जाती है, तो भविष्य में इस केस देश भर के लिए नजीर बनना तय समझो।
#एससीएसटी कानून कितना खतरनाक व भयावह है अब राहुल गांधी सहित सभी राजनीतिक दलों के वोटों के #लालचियो की समझ में आ जायेगा, कि व्यक्ति का प्रकरण से सीधा संबंध हो न हो यह बाद में कोर्ट में तय होगा लेकिन पहले प्रत्येक स्थिति में #बिना_जांच केस पंजीकरण कर सीधे #गिरफ्तारी का #प्रावधान है।
यह मामला हल्द्वानी निवासी अमित कुमार नामक व्यक्ति ने दर्ज कराया है, जो अनुसूचित जाति के वाल्मीकि समुदाय से आते हैं।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की एक रैली के बाद स्थानीय लोगों और एक संगठन ने रामलीला मैदान में साफ-सफाई कर शुद्धिकरण यज्ञ का आयोजन किया था।
इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए राहुल गांधी ने दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस अनुष्ठान को घोर दलित विरोधी कृत्य और छुआछूत का रूप बताते हुए आयोजकों पर कार्रवाई की मांग की थी।
इसके विपरीत शिकायतकर्ता का कहना है कि रैली के बाद मैदान में फैली गंदगी और शराब की बोतलों को साफ करने के बाद वहां पारंपरिक रूप से सामूहिक हवन किया गया था, जिसमें अनुसूचित जाति के लोग भी खुद शामिल थे।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि राहुल गांधी ने बिना तथ्यों को जाने एक सामान्य धार्मिक व सफाई अनुष्ठान को जातिगत रंग दिया, जिससे इस आयोजन में भाग लेने वाले वाल्मीकि समुदाय के लोगों की भावनाएं आहत हुईं और उन्हें समाज में गलत तरीके से पेश किया गया।
इसी शिकायत के आधार पर पुलिस ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज
कर जांच शुरू कर दी है, जिसके बाद कानून के इस्तेमाल और इसके राजनीतिक पहलुओं को लेकर बहस तेज हो गई है।
इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि जो राहुल गांधी हमेशा इस एक्ट और दलितों के अधिकारों के पक्ष में मुखर होकर बोलते रहे हैं, आज उन्हें खुद इसके ऐसे रूप का सामना करना पड़ रहा है।
आलोचकों और आम लोगों का मानना है कि इस मामले से यह साफ होता है कि यह कानून कितना घातक हो सकता है, क्योंकि जब राजनीतिक लाभ या निजी हितों के लिए देश के विपक्ष के इतने बड़े नेता पर इस तरह का केस दर्ज कराया जा सकता है, तो देश के आम सवर्ण और ओबीसी समाज के लोगों के खिलाफ जमीनी स्तर पर इस एक्ट का कितना गलत और एकतरफा इस्तेमाल किया जाता होगा।हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद रामलीला मैदान के कथित ‘शुद्धिकरण’ का मामला दिलचस्प होता जा रहा है। इस मसले पर बयानबाजी के बाद Rahul Gandhi के खिलाफ हल्द्वानी में धार्मिक भावनाएं भड़काने और झूठे आरोप लगाने की धाराओं में FIR दर्ज हो चुकी है। जबकि कांग्रेस खरगे की जाति का हवाला देकर इसे दलित अस्मिता से जोड़ते हुए मैदान का शुद्धिकरण करने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग कर रही है। अपने-अपने तर्कों के साथ दोनों ही दल एक-दूसरे पर हमलावर हैं। राहुल के आक्रामक रवैये को देखते हुए भाजपा भी अपने अस्त्र-शस्त्र से लैस होकर हर चुनौती का सामना करने को तैयार है।
पिछले कुछ दिनों से यह मामला देशभर में लगातार सुर्खियां बटोर रहा है। दोनों दलों के साइबर सोल्जर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक-दूसरे के बयानों को काटने के लिए आक्रामक कैंपेन चला रहे हैं। दलित अस्मिता को इस लड़ाई के केन्द्र में रखा गया है। आमने-सामने की इस राजनैतिक मोर्चाबंदी को जातीय ध्रुवीकरण और चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। दोनों दल अपनी-अपनी ताकत के अनुसार दांव चलने को आतुर नजर आ रहे हैं। चूंकि मामला सियासी है लिहाजा यह देखना जरूरी हो जाता है कि उत्तराखण्ड के चुनावों में दलित वोट बैंक का कितना महत्व है। 2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तराखण्ड में दलित आबादी लगभग 19 फीसद थी जबकि मौजूदा समय में उनकी जनसंख्या तकरीबन 25 लाख के आसपास है। जाहिर तौर पर यह आबादी राज्य की 70 विधानसभाओं सीटों में से 22 पर निर्णायक भूमिका में है। इसी आधार पर विधानसभा में 13 सीटें जबकि लोकसभा में एक सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। यही वजह है कि राजनैतिक दल दलितों को सत्ता में वापसी की गारंटी मानकर चलते आए हैं। इसीलिए लगभग सभी राजनैतिक दल दलितों से जुड़े किसी भी मुद्दे पर खुद को ज्यादा मुखर दिखाने का भरपूर प्रयास करते हैं। हालांकि सत्ता पक्ष या विपक्ष में रहते हुए उनकी प्राथमिकताएं और भूमिकाएं बदल जाती हैं। चूंकि उत्तराखण्ड में कांग्रेस विपक्ष में है लिहाजा खुद को दलितों के हितैषी दिखाने की भरपूर कोशिशें कर रही है।
रामलीला मैदान के कथित ‘शुद्धिकरण’ को दलित अस्मिता से जोड़ना भी कांग्रेस का ऐसा ही एक प्रयास है। इस मामले में दलित मताताओं की लामबंदी की पहल कांग्रेस की ओर से शुरू हुई। पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने संसद और फिर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस करके दिल्ली में इस मसले को उठाया। उन्होंने इस शुद्धिकरण को दलित विरोधी मानसिकता और छुआछूत (अस्पृश्यता) से जोड़ते हुए आयोजकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। राहुल गांधी ने हल्द्वानी प्रकरण को जातिगत भेदभाव के एक व्यापक कथित पैटर्न से जोड़ा, जिसमें स्कूलों में दलित बच्चों के साथ होने वाला व्यवहार, पानी तक पहुंच पर प्रतिबंध और चाय की दुकानों पर अलग कपों का हवाला दिया गया। उन्होंने कहा कि “चाय की दुकानों पर देखिए, दो तरह के कप इस्तेमाल होते हैं। एक कांच का कप, जिसे दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है और धोया जा सकता है। और दूसरा कागज या प्लास्टिक का कप, जिसे फेंक दिया जाता है। प्लास्टिक या कागज वाला कप दलितों के लिए है, और कांच वाला कप बाकी लोगों के लिए।” उन्होंने यहां तक कह दिया कि “आज भी स्कूलों में दलित बच्चों से शौचालय साफ करवाए जाते हैं। उनसे झाड़ू-पोछा करवाया जाता है। कुओं पर दलितों को पानी पीने की इजाजत नहीं है।” हालांकि, आरोप प्रत्यारोप के इस सिलसिले में मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami ने आज चाय की एक टपरी में डिस्पोजेबल ग्लास में चाय पीकर राहुल गांधी को आईना दिखाने का प्रयास किया।
वास्तविकता तो यह है कि राहुल गांधी के यह दावे अब बीते जमाने की बात हो चुके हैं। इतने हद दर्जे की अस्पृश्यता आमतौर पर अब कहीं देखने को नहीं मिलती। कम से कम पढ़ा लिखा समाज तो ऐसा भेदभाव कहीं नहीं करता। ऐसे में सवाल यह उठता है कि राहुल गांधी ने रामलीला मैदान के ‘शुद्धिकरण’ से दलित भेदभाव के मुद्दे को दलित अत्याचार से जोड़कर बातें बढ़ा-चढ़ाकर क्यों की। साफ है कि कांग्रेस इसे “छुआछूत और मनुवादी मानसिकता” के रूप में पेश कर रही है तकि चुनाव से पूर्व एक नैरेटिव स्थापित किया जा सके। दूसरी ओर शुद्धिकरण करने वाले हिंदूवादी संगठन का तर्क है कि कार्यक्रम स्थल एक ‘रामलीला मैदान’ (धार्मिक स्थल) है। रैली के दौरान वहां गंदगी फैलाई गई और सनातन धर्म के खिलाफ नारेबाजी की गई, इसलिए वहां केवल स्वच्छता अभियान और हवन किया गया। इधर, भाजपा भी इसे जाति से नहीं बल्कि “धार्मिक स्थल की शुचिता” से जोड़ रही है। इसलिए क्योंकि भाजपा का ऐजेंडा हार्डकोर हिन्दुत्व रहा है वो नहीं चाहती कि किसी भी कीमत में हिन्दू वोट में बिखराव हो। इन परिस्थतियों में ‘सियासी कशमकश’ के बीच निर्भर इस बात पर करता है कि जनता कांग्रेस के ‘दलित स्वाभिमान’ कार्ड और भाजपा के ‘धार्मिक स्थल की पवित्रता’ वाले तर्क में से किसे ज्यादा स्वीकार करती है।
भारत की संसद में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर #एससीएसटी एक्ट के अन्तर्गत हल्द्वानी थाने में पंजीकृत मुकदमें में राहुल गांधी गिरफ्तार होते हैं तो उनकी राजनीतिक परेशानी बढ़नी निश्चित रूप से तय है। और यदि उनकी गिरफ्तारी नहीं होती या उन्हें अग्रिम जमानत मिल जाती है, तो भविष्य में इस केस देश भर के लिए नजीर बनना तय समझो।
#एससीएसटी कानून कितना खतरनाक व भयावह है अब राहुल गांधी सहित सभी राजनीतिक दलों के वोटों के #लालचियो की समझ में आ जायेगा, कि व्यक्ति का प्रकरण से सीधा संबंध हो न हो यह बाद में कोर्ट में तय होगा लेकिन पहले प्रत्येक स्थिति में #बिना_जांच केस पंजीकरण कर सीधे #गिरफ्तारी का #प्रावधान है।
