1947 में धर्म और मजहब के आधार पर बटवारा हुआ—पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बना, जबकि भारत को धर्मनिरपेक्षता के रास्ते पर धकेल दिया गया

1947 में धर्म और मजहब के आधार पर बटवारा हुआ—पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बना, जबकि भारत को धर्मनिरपेक्षता के रास्ते पर धकेल दिया गया । बहुत से लोगों को लगता है कि यह निर्णय हिंदुओं के लिए अनुचित था और सवाल करते रहते हैं कि वे कभी-कभी अपने ही देश में द्वितीय श्रेणी के नागरिक बना कर काहे रखे गये!! 

ये भावनाएं ऐतिहासिक दर्द, राजनीतिक अनुभवों और असमान उपचार की धारणाओं से आती हैं। साथ ही, धर्मनिरपेक्षता का भारत का संवैधानिक विचार हर नागरिक के लिए समान अधिकार और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए था, चाहे कोई भी आस्था हो। आज की असली बहस खुद सिद्धांत पर नहीं है, बल्कि जमीन पर इसे कितने निष्पक्ष और लगातार लागू किया जा रहा है।

लोकतंत्र में इन चिंताओं को दूर करने के लिए खुले संवाद, संवैधानिक मूल्यों और कानूनों का समान उपयोग आवश्यक है। ( साभार शोशल मीडिया – https://www.facebook.com/share/p/1CHA5EfavT/) 

जब किसी देश में राष्ट्रभक्ति केवल भावना नहीं बल्कि संकल्प बन जाए, तब इतिहास की दिशा बदलती है। भारत आज उसी दौर से गुजर रहा है, जहाँ देश के भविष्य को लेकर स्पष्ट सोच, मजबूत इरादे और निडर नेतृत्व की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कही गई यह बात कि वह देश की भलाई के लिए आए थे लेकिन अब देश के भीतर और बाहर छिपे गद्दारों से संघर्ष कर रहे हैं, केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं है। यह उस पीड़ा और जिम्मेदारी की अभिव्यक्ति है, जिसे एक सच्चा राष्ट्रसेवक ही महसूस कर सकता है।

भारत आज अभूतपूर्व विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है। आधारभूत ढांचे से लेकर डिजिटल क्रांति तक, रक्षा क्षेत्र से लेकर वैश्विक कूटनीति तक, हर मोर्चे पर देश की स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी कोई राष्ट्र प्रगति करता है, तब उसे रोकने के प्रयास भी तेज हो जाते हैं। कुछ ताकतें बाहर से भारत की बढ़ती ताकत से असहज हैं, तो कुछ अंदर बैठकर विकास की गति को बाधित करने का प्रयास करती हैं। ऐसे तत्वों का उद्देश्य केवल सत्ता या स्वार्थ नहीं, बल्कि देश की एकता और आत्मविश्वास को कमजोर करना होता है।

इस चुनौतीपूर्ण समय में प्रधानमंत्री मोदी अकेले नहीं खड़े हैं। उनके पीछे 140 करोड़ भारतीयों का विश्वास, साहस और समर्थन है। यह समर्थन किसी प्रचार से नहीं, बल्कि अनुभव से उपजा है। लोगों ने देखा है कि कैसे वर्षों से लंबित निर्णय लिए गए, कैसे राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई और कैसे भारत की आवाज़ दुनिया के मंचों पर मजबूती से रखी गई। यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो भारत को आत्मनिर्भर, सशक्त और सम्मानित राष्ट्र बनते देखना चाहती है।

राष्ट्रभक्ति केवल नारे लगाने तक सीमित नहीं होती। यह अपने कर्तव्यों को समझने, देशहित में सही और गलत की पहचान करने और आवश्यकता पड़ने पर स्पष्ट पक्ष लेने का साहस भी मांगती है। आज सवाल यह नहीं है कि कौन किस पार्टी के साथ है, बल्कि यह है कि कौन देश के साथ खड़ा है। जब राष्ट्रविरोधी ताकतें भ्रम फैलाने, समाज को बांटने और विकास को रोकने का प्रयास करती हैं, तब चुप रहना भी एक तरह की सहमति बन जाता है।

विकसित भारत का सपना केवल सरकार का एजेंडा नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है। यह सपना तभी साकार होगा जब देश के भीतर मौजूद नकारात्मक और विध्वंसक सोच का डटकर सामना किया जाए। आलोचना और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राष्ट्र को कमजोर करने की मंशा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती। यही फर्क होता है स्वस्थ आलोचना और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में।

आज भारत की युवा पीढ़ी पहले से अधिक जागरूक है। वह जानती है कि देश को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ अधिकार नहीं, कर्तव्य भी जरूरी हैं। वह समझती है कि सोशल मीडिया पर फैलने वाले झूठे नैरेटिव, आधे-अधूरे सच और भ्रामक सूचनाएं किस तरह राष्ट्रहित को नुकसान पहुंचा सकती हैं। ऐसे में हर जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी बनती है कि वह सही बात के साथ खड़ा हो और गलत को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करे।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह दिखाया है कि मजबूत इरादों से बड़े से बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। चाहे आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख हो, या फिर आत्मनिर्भर भारत की दिशा में उठाए गए कदम, हर निर्णय के केंद्र में राष्ट्रहित रहा है। यही कारण है कि देश का बड़ा वर्ग इस नेतृत्व पर भरोसा करता है और उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।

अब समय है चुप्पी तोड़ने का। समय है यह स्पष्ट करने का कि हम किसके साथ हैं। अगर आप मानते हैं कि भारत की प्रगति के रास्ते में रोड़े अटकाने वाली ताकतों का विरोध जरूरी है, अगर आप एक सुरक्षित, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की कल्पना करते हैं, तो आपकी आवाज़ मायने रखती है। लोकतंत्र में जनता की भागीदारी केवल मतदान तक सीमित नहीं होती, बल्कि विचार और समर्थन के माध्यम से भी सामने आती है।

 

सत्य को कई बार परेशान किया जा सकता है, लेकिन उसे पराजित नहीं किया जा सकता। भारत की आत्मा मजबूत है, और जब देशवासी एकजुट होते हैं, तब कोई भी शक्ति उसे कमजोर नहीं कर सकती। आज आवश्यकता है एकता, स्पष्टता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की। यही रास्ता भारत को न केवल विकसित राष्ट्र बनाएगा, बल्कि विश्व मंच पर एक सशक्त नेतृत्व के रूप में स्थापित करेगा।

डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य राजनीतिक टिप्पणी और सार्वजनिक घटनाओं पर आधारित है।

(लेख साभार लिए गये हैं संपादक ✍️हरीश मैखुरी)