उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami को देशभर के मुख्यमंत्रियों में से राजनीति का सबसे सौम्य चेहरा माना जाता है। इस बात से सत्ता पक्ष ही नहीं, विपक्ष के लोग भी इंकार नहीं करेंगे कि वह अपनी बात को सलीके से रखना बखूबी जानते हैं। सादगी उनकी पहचान है। राजनैतिक सौहार्द निभाने में उनका कोई सानी नहीं हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से धामी के तेवर बदले हुए हैं। अंदाज में आक्रामकता है। भाषा में भी तल्खी है। खासतौर पर Rahul Gandhi के तीखे प्रश्नों का वह सीधा प्रत्युत्तर करअअ रहे हैं। कांग्रेस के खिलाफ मोर्चे की कमान उन्होंने स्वयं के हाथों में ली है। राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोग धामी के मिजाज में अचानक आई इस बदलाव के अर्थ खोज रहे हैं।
जेन जी के आन्दोलन को कवरेज क्या मिली कि कांग्रेस की बांछें खिली हुई हैं। पार्टी की ओर से कहा गया कि शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे का श्रेय राहुल गांधी को जाता है क्योंकि संसद से लेकर पीएम आवास तक राहुल आक्रामक न होते तो जेन जी के आन्दोलन को बल नहीं मिलता। जबकि, क्रॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं ने राहुल को कभी भाव नहीं दिया। यही वजह रही कि राहुल एक दिन भी जंतर मंतर पर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। युवाओं का आन्दोलन खत्म हुआ तो सीजेपी नेताओं ने आन्दोलन में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी लोगों का शुक्रिया अदा किया लेकिन व्यक्तिगत रूप से राहुल को कभी थैंक्स नहीं कहा। जबकि इधर, युवा कांग्रेस के सोशल मीडिया हैंडल ने थैंक यू राहुल गांधी लिखे पोस्टरों और वीडियो के जरिए यह दिखाने की कोशिश करी कि जेन जी राहुल के साथ खड़े हैं। उत्साहित कांग्रेस ने देश के विभिन्न हिस्सों कोटा, पूणे, प्रयागराज और देहरादून में जाकर छात्रों की गूंज कार्यक्रम आयोजित किए, जहां राहुल ने युवाओं से परीक्षा में देरी, पेपर लीक और अन्य मुद्दों पर सीधा संवाद किया।
जेन जी आन्दोलन और छात्रों की गूंज कार्यक्रम में जुटी युवाओं की भीड़ को देखकर राहुल गांधी इस खुशफहमी में हैं कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड समेत पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में कांग्रेस तख्ता पलट करने वाली है। यूं तो 2027 के शुरुआत में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड, गोवा और मणिपुर में लगभग एक साथ चुनाव होने हैं लेकिन कांग्रेस का विशेष फोकस उत्तराखण्ड पर है। खास रणनीति के चलते कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल जैसे शीर्ष नेता उत्तराखण्ड में जनसभा अथवा बैठकें आयोजित कर चुके हैं। अब प्रियंका गांधी जल्द ही उत्तराखण्ड आयेंगी। दरअसल, जिन पांच राज्यों में चुनाव होने हैं उनमें से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को कोई पूछता नहीं, पंजाब में कांग्रेसियों की गुटबाजी ने पार्टी का सबसे ज्यादा बेड़ा गर्क कर रखा है, वहां जमीनी स्तर पर आम आदमी पार्टी के साथ भाजपा और अकाली दल भी सक्रिय हैं। मणिपुर और गोवा में भाजपा का दबदबा कायम है। ऐसे में सिर्फ उत्तराखण्ड ही है जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है और वोट की एक दो परसेंट बढ़त सत्ता में अदला बदली कर सकती है। इसीलिए कांग्रेस उत्तराखण्ड में चांस लेना चाहती है। यही वजह है कि एक सोची समझी व्यूह रचना के तहत राहुल ने मोहम्मद दीपक, दलित स्वाभिमान प्रकरण और छात्रों की गूंज कार्यक्रम से सीधे खुद को जोड़े रखा। लेकिन हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद रामलीला मैदान के ‘शुद्धिकरण’ के मामले को दलित स्वाभिमान से जोड़ते हुए राहुल गांधी बहुत कुछ अनर्गल कह गए। इस अनुष्ठान को उन्होंने दलित पहचान को निशाना बनाने वाला कृत्य और ‘छुआछूत’ बताते हुए आयोजकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग कर डाली। जिस पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पलटवार करते हुए कहा कि रैली के दौरान रामलीला मंच पर धार्मिक उन्माद और जिहादी नारे लगाए गए तथा गंदगी फैलाई गई, जिसके विरोध में स्थानीय धार्मिक संगठनों ने अपनी आस्था के तहत शुद्धि अनुष्ठान किया गया था। लेकिन लिंक देखो कांग्रेस के दलित नरेटिव का उन्ही के कार्यकर्ताओं ने जुलूस निकाल दिया।
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देर किए बिना उत्तराखण्ड पुलिस ने झूठी बातें फैलाने और समाज को जाति में बांटने की कोशिश के आरोप में राहुल गांधी पर एफआईआर दर्ज कर दी। इससे पहले राहुल ने ‘शुद्धिकरण’ के मामले आयोजकों पर एफआईआर दर्ज न होने पर उत्तराखण्ड में बड़ा आन्दोलन करने की चेतावनी दी थी, लेकिन धामी सरकार उनके दबाव में नहीं आई। राहुल को लगता था कि दिल्ली के एक थाने में धरना देकर दबाव बनाने का उनका फार्मूला उत्तराखण्ड में भी कामयाब हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके विपरीत मुख्यमंत्री धामी राहुल गांधी पर और ज्यादा हमलावर हो गए। पिछले तीन दिनों से जिस भी कार्यक्रम में धामी गए वहां उन्होंने राहुल पर तीखे जुबानी हमले करने के साथ ही उनसे तल्ख सवाल भी किए। पहली बार उनको आक्रामक शब्दावली का प्रयोग करते भी देखा गया। ठीक वैसी शब्दावली जैसी राहुल अक्सर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए करते हैं। धामी के इस व्यवहार को जैसे को तैसा (Tit for Tat) या रणनीतिक जवाब के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि कुछ राजनैतिक विश्लेषक इसे “सिंड्रोम ऑफ अटेंशन” भी कहते हैं। अब आमने सामने की इस राजनैतिक लड़ाई में राहुल और धामी एक दूसरे के समकक्ष खड़े हो गए हैं। सच यह भी है कि धामी आज की तिथि में एक सफल राजनेता हैं। उत्तराखण्ड में बतौर मुख्यमंत्री सबसे लम्बे कार्यकाल का रिकॉर्ड उनके नाम हो चुका है। आगे उनकी पारी जारी है। वह जानते हैं कि कई बार आक्रामक व्यवहार राजनैतिक विरोधियों को रक्षात्मक होने पर मजबूर कर देता है। राजनीति शास्त्र भी कहता है कि एक सफल राजनेता को परिस्थिति के अनुसार अपने व्यवहार में बदलाव करते रहना चाहिए, खासतौर पर उन संवेदनशील मामलों में जहां दृढ़ता आवश्यक है। ✍️ साभार
