ईरान से इस समय भयंकर नरसंहार के समाचार हैं! खामनई के आदेश के बाद आयतुल्ला की निजी सेना इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड (IRG) ने 3500 से अधिक ईरानियों को मौत के घाट उतार दिया है। मशीन गन से ईरानियों पर फायरिंग की जा रही है, आंदोलनकारी लड़कियों का सामूहिक बलात्कार कर उनकी दयनीय हालात बना दी गई है। लेकिन आश्चर्यचकित करने वाली बात है कि लोकतंत्र की स्थापना के लिए हो रहे इन मौतों पर पूरी दुनियां के लोकतंत्रात्मक देशों और लोकतंत्र समर्थकों और नारी स्वतंत्रता के झंडाबरदारों के मुंह में दही जम गया है। इस दुर्दांत इस्लामिक नरसंहार पर उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकल पा रहा है। भारत में जो लोग फिलिस्तीन जैसे आतंकी देश का झंडा उठाये थे वे ईरान के लोकतांत्रिक आन्दोलन को निर्ममता से कुचले जाने और तीन हजार से अधिक मौतों पर चुप हैं।
अमरीका में इस समय रात्रि है, अमरीका की शनिवार देर रात्रि ट्रंप को ब्रीफ किया गया है सैन्य विकल्पों को लेके। व्हाइट हाउस में चल रही हलचल के पश्चात इसरायल अलर्ट मोड पे है। वहीं आयतुल्ला ने राजधानी तेहरान में अपने लाव-लश्कर को हाई अलर्ट पर रखा है।
“ख़ुदा का दुश्मन” की राजनीति: ईरान में प्रदर्शन,फाँसी की धमकी और सत्ता की रणनीति!
ईरान एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है,जहाँ राज्य की शक्ति,धर्म और जनता का आक्रोश आमने-सामने आ गया है। सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों को “ख़ुदा का दुश्मन” बताकर मृत्युदंड की धमकी देना केवल क़ानूनी चेतावनी नहीं बल्कि एक गहरी राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक रणनीति का संकेत है। अब तक सामने आए आँकड़ों के अनुसार हिंसा में 200 से अधिक लोगों की मौत और 2600 से ज़्यादा गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं। सवाल यह नहीं है कि ईरान में प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं सवाल यह है कि सरकार ने प्रतिक्रिया के तौर पर सबसे कठोर धार्मिक हथियार क्यों चुना?
1. “ख़ुदा का दुश्मन”: क़ानून से ज़्यादा एक संदेश
ईरान की इस्लामिक रिपब्लिक में “मोहरेब” का आरोप लगना सामान्य अपराध नहीं है। यह आरोप व्यक्ति को सिर्फ़ राज्य का नहीं बल्कि ईश्वर का विरोधी घोषित करता है। इसका सीधा अर्थ है:
* विरोध= अपराध
* असहमति= गुनाह
* प्रदर्शन= धार्मिक गद्दारी
यह भाषा क़ानूनी प्रक्रिया से ज़्यादा डर पैदा करने का औज़ार है। सरकार जानती है कि हर प्रदर्शनकारी को सज़ा देना संभव नहीं लेकिन सज़ा का डर फैलाना संभव है।
2. बढ़ती मौतें: नियंत्रण या उकसावा? सूत्रों के अनुसार मारे गये प्रदर्शनकारी युवाओं का आंकड़ा 3500 से अधिक है लेकिन सरकारी आंकड़ों के अनुसार 217 मौतें और हज़ारों गिरफ्तारियाँ यह दिखाती हैं कि राज्य अब नियंत्रण से आगे जाकर दमन की नीति अपना चुका है। यह रणनीति दोहरे जोखिम वाली है:
अल्पकालिक लाभ
* सड़कों पर भीड़ कम हो सकती है
* भय के कारण लोग पीछे हट सकते हैं
दीर्घकालिक खतरा
* हर मौत एक नया प्रतीक बनती है
* हर गिरफ्तारी गुस्से को गहरा करती है
इतिहास बताता है कि धार्मिक या वैचारिक सत्ता जब हिंसा को अंतिम समाधान मान लेती है तो विरोध अक्सर और व्यापक होता है।
3. धर्म बनाम जनता: वैधता का संकट
ईरान की सत्ता की वैधता तीन स्तंभों पर टिकी है:
* इस्लामी विचारधारा
* क्रांति की विरासत
* सुरक्षा तंत्र
जब सरकार को विरोध दबाने के लिए “ख़ुदा का दुश्मन” जैसे शब्दों का सहारा लेना पड़े तो यह संकेत है कि सत्ता को अब जनता की सहमति पर भरोसा नहीं रहा। यह सिर्फ़ राजनीतिक असंतोष नहीं बल्कि वैधता का संकट है,जहाँ सरकार खुद को बचाने के लिए धर्म को ढाल बना रही है।
4. अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाम आंतरिक डर
ईरान पहले से ही प्रतिबंधों,आर्थिक संकट,कूटनीतिक अलगाव
का सामना कर रहा है। ऐसे में व्यापक हिंसा और मृत्युदंड की धमकियाँ अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाती हैं। मानवाधिकार संगठनों को सक्रिय करती हैं लेकिन सत्ता का गणित अलग है। “अंदरूनी चुनौती अंतरराष्ट्रीय आलोचना से ज़्यादा ख़तरनाक है।” इसीलिए सरकार फिलहाल बाहरी प्रतिक्रिया की परवाह किए बिना आंतरिक नियंत्रण को प्राथमिकता दे रही है।
5. आगे क्या? तीन संभावित रास्ते
A. दमन से अस्थायी शांति
प्रदर्शन कुछ समय के लिए दब सकते हैं लेकिन असंतोष अंदर ही अंदर पकता रहेगा।
B. आंदोलन का रूपांतरण
सड़कों से हटकर विरोध गुप्त नेटवर्क,र्आर्थिक असहयोग,सांस्कृतिक प्रतिरोध का रूप ले सकता है।
C. निर्णायक टकराव
अगर मौतों और फाँसी की सज़ाएँ बढ़ीं,तो यह आंदोलन विखंडित विरोध से संगठित विद्रोह की ओर जा सकता है।
निष्कर्ष: डर की राजनीति कितने समय तक?
ईरान में हो रहा यह संघर्ष केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है। यह सवाल है क्या कोई सरकार अपने ही नागरिकों को “ख़ुदा का दुश्मन” कहकर लंबे समय तक शासन कर सकती है? इतिहास गवाह है डर से चुप्पी खरीदी जा सकती है लेकिन सहमति नहीं। ईरान की मौजूदा रणनीति शायद आज की सड़कों को खाली कर दे,पर उसने भविष्य की राजनीति को और अस्थिर बना दिया है। #
