सत्ता का समीकरण और अस्तित्व का संकट: स्वर्ण समाज के लिए एक ऐतिहासिक चेतावनी
भारत की राजनीति आज उस मोड़ पर है जहाँ ‘विरोध’ और ‘विकल्प’ के बीच की रेखा धुंधली हो गई है। वर्तमान में जो स्वर्ण समाज राजनैतिक नाराजगी के कारण ‘मोदी विरोध’ या ‘सत्ता परिवर्तन’ की बात कर रहा है, उसे अपनी रणनीति को भावनाओं के बजाय कठोर तकनीकी आंकड़ों और इतिहास के कड़वे अनुभवों की कसौटी पर कसना होगा।
1. जनसांख्यिकीय चक्रव्यूह और 52% का गणित
यदि हम भारत की चुनावी बिसात को देखें, तो यह आंकड़ों का एक ऐसा खेल है जहाँ मामूली सी चूक आत्मघाती हो सकती है।
* गठबंधन का संकट: यदि 20% मुस्लिम मतदाता और लगभग 32% SC/ST वर्ग एक विशेष राजनैतिक नैरेटिव (जैसे ‘संविधान बचाओ’ या ‘जातिगत जनगणना’) के तहत पूरी तरह एकजुट हो जाते हैं, तो यह 52% का एक अभेद्य ब्लॉक बनाता है।
* अल्पसंख्यक का भय: शेष 48% में स्वर्ण, ओबीसी और अन्य वर्ग विभाजित हैं। ऐसी स्थिति में, स्वर्ण समाज (जो आबादी का लगभग 10-15% है) राजनैतिक रूप से पूरी तरह ‘अप्रासंगिक’ हो जाएगा। इतिहास गवाह है कि सत्ता में जब ‘वोट बैंक’ की ताकत भारी होती है, तो नीति निर्धारण में सबसे पहले बलि उसी वर्ग की दी जाती है जिसकी राजनैतिक सौदेबाजी की शक्ति शून्य हो।
2. इतिहास की गूँज: विखंडन से विनाश तक
इतिहास से बड़ा कोई गुरु नहीं होता। स्वर्ण समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि जब-जब समाज का अग्रणी वर्ग आंतरिक कलह के कारण विभाजित हुआ, तब-तब उसने अपनी सत्ता और अस्तित्व दोनों खोए हैं।
* राजाओं का दौर: भारतीय इतिहास में पृथ्वीराज चौहान से लेकर मराठों तक की हार का मुख्य कारण ‘सामूहिक शत्रुओं’ के विरुद्ध एकजुट न होना और आंतरिक नाराजगी को प्राथमिकता देना था।
* वैश्विक संदर्भ: विश्व भर में जहाँ भी बहुसंख्यक समाज वैचारिक रूप से बिखरा, वहाँ कट्टरपंथी और संगठित अल्पमत ने सत्ता पर कब्जा किया। स्वर्ण समाज को सोचना होगा कि क्या उनका वर्तमान ‘मोदी विरोध’ उन्हें एक ऐसे भविष्य की ओर ले जा रहा है जहाँ उनके पास अपनी बात रखने के लिए कोई राजनैतिक मंच ही नहीं बचेगा?
3. ‘शरण’ नहीं, यह ‘रणनीतिक आवश्यकता’ है
इसे केवल “भाजपा की शरण” के रूप में देखना संकुचित दृष्टिकोण होगा। तकनीकी रूप से, यह अस्तित्वगत रक्षा का मामला है।
* सुरक्षा का कवच: वर्तमान केंद्र सरकार ने वैश्विक स्तर पर हिंदू हितों और भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को एक स्वर दिया है। “दुश्मन पूरे विश्व में हैं” की बात आज की ‘इन्फॉर्मेशन वारफेयर’ और ‘ग्लोबल नैरेटिव’ के दौर में सच साबित होती है, जहाँ हिंदू धर्म को अक्सर निशाना बनाया जाता है।
* शक्ति का ध्रुवीकरण: यदि स्वर्ण समाज अपनी नाराजगी के चलते मोदी या भाजपा का अंत चाहता है, तो उसे यह भी सोचना होगा कि ‘विकल्प’ के रूप में जो शक्ति आएगी, उसका आधार क्या होगा? क्या वह आधार स्वर्ण समाज के हितों, शिक्षा, आरक्षण की चुनौतियों और सांस्कृतिक मानों का सम्मान करेगा?
4. तकनीकी सत्य: ‘अहंकार’ बनाम ‘अस्तित्व’
स्वर्ण समाज का एक हिस्सा अक्सर अपनी परंपरा और बौद्धिक श्रेष्ठता के कारण ‘अहंकार’ या ‘नाराजगी’ में आकर मतदान से विमुख हो जाता है। लेकिन आधुनिक लोकतंत्र में ‘बौद्धिक श्रेष्ठता’ की गिनती नहीं होती, केवल ‘सिरों’ (Heads) की गिनती होती है।
* यदि 52% का संगठित मोर्चा तैयार है, तो स्वर्ण समाज का बिखराव उनकी अगली कई पीढ़ियों के लिए ‘राजनैतिक निर्वासन’ का कारण बन सकता है।
निष्कर्ष
स्वर्ण समाज को वर्तमान नेतृत्व से शिकायतें हो सकती हैं, और लोकतंत्र में विरोध का अधिकार भी है। परंतु, इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि “जब आप अपने रक्षक को खत्म करने की कोशिश करते हैं, तो आप अनजाने में अपने शिकारी का रास्ता साफ कर रहे होते हैं।”
आज का समय ‘विकल्प’ खोजने का नहीं, बल्कि ‘एकजुट’ होकर अपनी रक्षात्मक शक्ति को बनाए रखने का है। क्योंकि इतिहास केवल विजेताओं का लिखा जाता है, उनका नहीं जो सही होते हुए भी बिखरे हुए थे और हार गए।
सिद्धार्थ सिंह,,,,,
अखण्ड भारत युवा दल,,,,,,,
सत्ता का समीकरण और अस्तित्व का संकट: स्वर्ण समाज के लिए एक ऐतिहासिक चेतावनी
भारत की राजनीति आज उस मोड़ पर है जहाँ ‘विरोध’ और ‘विकल्प’ के बीच की रेखा धुंधली हो गई है। वर्तमान में जो स्वर्ण समाज राजनैतिक नाराजगी के कारण ‘मोदी विरोध’ या ‘सत्ता परिवर्तन’ की बात कर रहा है, उसे अपनी रणनीति को भावनाओं के बजाय कठोर तकनीकी आंकड़ों और इतिहास के कड़वे अनुभवों की कसौटी पर कसना होगा।
1. जनसांख्यिकीय चक्रव्यूह और 52% का गणित
यदि हम भारत की चुनावी बिसात को देखें, तो यह आंकड़ों का एक ऐसा खेल है जहाँ मामूली सी चूक आत्मघाती हो सकती है।
* गठबंधन का संकट: यदि 20% मुस्लिम मतदाता और लगभग 32% SC/ST वर्ग एक विशेष राजनैतिक नैरेटिव (जैसे ‘संविधान बचाओ’ या ‘जातिगत जनगणना’) के तहत पूरी तरह एकजुट हो जाते हैं, तो यह 52% का एक अभेद्य ब्लॉक बनाता है।
* अल्पसंख्यक का भय: शेष 48% में स्वर्ण, ओबीसी और अन्य वर्ग विभाजित हैं। ऐसी स्थिति में, स्वर्ण समाज (जो आबादी का लगभग 10-15% है) राजनैतिक रूप से पूरी तरह ‘अप्रासंगिक’ हो जाएगा। इतिहास गवाह है कि सत्ता में जब ‘वोट बैंक’ की ताकत भारी होती है, तो नीति निर्धारण में सबसे पहले बलि उसी वर्ग की दी जाती है जिसकी राजनैतिक सौदेबाजी की शक्ति शून्य हो।
2. इतिहास की गूँज: विखंडन से विनाश तक
इतिहास से बड़ा कोई गुरु नहीं होता। स्वर्ण समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि जब-जब समाज का अग्रणी वर्ग आंतरिक कलह के कारण विभाजित हुआ, तब-तब उसने अपनी सत्ता और अस्तित्व दोनों खोए हैं।
* राजाओं का दौर: भारतीय इतिहास में पृथ्वीराज चौहान से लेकर मराठों तक की हार का मुख्य कारण ‘सामूहिक शत्रुओं’ के विरुद्ध एकजुट न होना और आंतरिक नाराजगी को प्राथमिकता देना था।
* वैश्विक संदर्भ: विश्व भर में जहाँ भी बहुसंख्यक समाज वैचारिक रूप से बिखरा, वहाँ कट्टरपंथी और संगठित अल्पमत ने सत्ता पर कब्जा किया। स्वर्ण समाज को सोचना होगा कि क्या उनका वर्तमान ‘मोदी विरोध’ उन्हें एक ऐसे भविष्य की ओर ले जा रहा है जहाँ उनके पास अपनी बात रखने के लिए कोई राजनैतिक मंच ही नहीं बचेगा?
3. ‘शरण’ नहीं, यह ‘रणनीतिक आवश्यकता’ है
इसे केवल “भाजपा की शरण” के रूप में देखना संकुचित दृष्टिकोण होगा। तकनीकी रूप से, यह अस्तित्वगत रक्षा का मामला है।
* सुरक्षा का कवच: वर्तमान केंद्र सरकार ने वैश्विक स्तर पर हिंदू हितों और भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को एक स्वर दिया है। “दुश्मन पूरे विश्व में हैं” की बात आज की ‘इन्फॉर्मेशन वारफेयर’ और ‘ग्लोबल नैरेटिव’ के दौर में सच साबित होती है, जहाँ हिंदू धर्म को अक्सर निशाना बनाया जाता है।
* शक्ति का ध्रुवीकरण: यदि स्वर्ण समाज अपनी नाराजगी के चलते मोदी या भाजपा का अंत चाहता है, तो उसे यह भी सोचना होगा कि ‘विकल्प’ के रूप में जो शक्ति आएगी, उसका आधार क्या होगा? क्या वह आधार स्वर्ण समाज के हितों, शिक्षा, आरक्षण की चुनौतियों और सांस्कृतिक मानों का सम्मान करेगा?
4. तकनीकी सत्य: ‘अहंकार’ बनाम ‘अस्तित्व’
स्वर्ण समाज का एक हिस्सा अक्सर अपनी परंपरा और बौद्धिक श्रेष्ठता के कारण ‘अहंकार’ या ‘नाराजगी’ में आकर मतदान से विमुख हो जाता है। लेकिन आधुनिक लोकतंत्र में ‘बौद्धिक श्रेष्ठता’ की गिनती नहीं होती, केवल ‘सिरों’ (Heads) की गिनती होती है।
* यदि 52% का संगठित मोर्चा तैयार है, तो स्वर्ण समाज का बिखराव उनकी अगली कई पीढ़ियों के लिए ‘राजनैतिक निर्वासन’ का कारण बन सकता है।
निष्कर्ष
स्वर्ण समाज को वर्तमान नेतृत्व से शिकायतें हो सकती हैं, और लोकतंत्र में विरोध का अधिकार भी है। परंतु, इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि “जब आप अपने रक्षक को खत्म करने की कोशिश करते हैं, तो आप अनजाने में अपने शिकारी का रास्ता साफ कर रहे होते हैं।”
आज का समय ‘विकल्प’ खोजने का नहीं, बल्कि ‘एकजुट’ होकर अपनी रक्षात्मक शक्ति को बनाए रखने का है। क्योंकि इतिहास केवल विजेताओं का लिखा जाता है, उनका नहीं जो सही होते हुए भी बिखरे हुए थे और हार गए। ✍️ सिद्धार्थ सिंह
अखण्ड भारत युवा दल,,,,,,,#राजसत्ता_की_शक्ति
-मुल्ले दीपक मुहम्मद की जिम में हिंदुओं ने जाना बंद किया।
-एक हिन्दू छात्रा ने हनुमान जी का अपमान करने पर मुस्लिम शिक्षिका को क्लास में पीटा।
-लव जेहादी मुस्लिमों को ढूंढ-ढूंढ कर उनको सबक सिखाया जा रहा है।
-अवैध कब्जे वाली मजारों व मस्जिदों को ध्वस्त किया जा रहा है।
-वक्फ बोर्ड के अवैध कब्जे से संपतियों को वापस लिया जा रहा है।
-सड़कों पर नमाज का विरोध अब हिन्दू सामूहिक रूप से करने लगे हैं।
-होली व ईद साथ पड़ने पर हिंदुओं को रंग खेलने की टाइम लाइन नहीं दी जाती।
-मस्जिद की अजान के समय घण्टे बजने पर रोक नहीं है बल्कि लाउड स्पीकर पर हनुमान चालीसा बजता है।
-तानाजी, शंभाजी जैसे ऐतिहासिक विषयों पर और कश्मीर फाइल्स, एनीमल व धुरंधर जैसे महीन हिन्दू नैरेटिव को पुष्ट करने वाली मूवी बन रही हैं।
-सलमान खान को संघ के सम्मेलन में आना पड़ रहा है।
-कम ही सही लेकिन हिन्दू लड़के मुस्लिम लड़कियों को हिन्दू बनाकर विवाह कर रहे।
-कम ही सही लेकिन मुस्लिमों में घर वापसी शुरू हुई है।
मोदी जी द्वारा किये ढेरों हिंदुत्व संवर्धन के ढेरों मामले गिनवा सकता हूँ लेकिन अगर आप ध्यान दें तो मैंने वे बातें गिनवाई हैं जो सरकार के स्तर पर नहीं हिंदुओं में सामाजिक जागरण व सामूहिक प्रतिरोध के तौर पर शुरू हुई हैं और हिन्दू अब अपने चुप्पी और सहनशीलता के खोल को त्याग कर आक्रामक रूप में आना प्रारम्भ हुआ है।
क्यों और कैसे?
2014 से पहले हिन्दू क्यों इतना कमजोर दिखता था?
2014 से क्या बदल गया अचानक?
हिन्दू भले बौरा रहे हों लेकिन मुस्लिम जानता है कि यह राजसत्ता का प्रभाव है क्योंकि शीर्ष पर ऐसे लोग बैठे हैं जिनके रहते उनकी हर हिंदुत्व विरोधी हरकत को कुचल दिया जायेगा।
लेकिन सत्ता का मद योगी मोदी पर चढ़ा हो न चढ़ा हो लेकिन हिंदुओं पर चढ़ गया है।
“दलित कुंठितों को, सवर्णो विशेषतः ब्राह्मणों को यूरेशिया भेजना है एवं सवर्ण कुंठितों को आरक्षण व यूजीसी हटवाना है और मजे की बात यह है कि दोनों को लगता है एसा मोदी को केंद्र से हटाकर किया जा सकता है।”
अब बताओ पप्पू कौन है? राहुल या तुम??
अभी सत्ता जाने दो, अगले दिन से कुत्ते की तरह औकात दिखा दी जायेगी सारे हिंदुओं को।
दलित या सवर्ण सबको मिलेगा बाबाजी का ठुल्लू।
सारे तथाकथित धर्मयोद्धा या तो जेल में दिखेंगे या अपने बिलों में या सत्ता के तलवे चाटते हुए।
-फिर लगाना हाथ किसी मजार को चाहे वह तुम्हारे घर में घुसकर ही क्यों न बना दें,
-फिर रोकना नमाज को चाहे वह तुम्हारे मंदिरों में घुसकर ही क्यों न पढ़ें,
-फिर करना लव जेहाद का विरोध, चाहे वे घर में घुसकर बहू बेटियों पर हाथ डालें,
और जिनको यह लग रहा है कि मैं डरा रहा हूँ तो मैं भी चाहता हूँ तुम अपना जातिवादी कुत्तपना दिखाओ और लेकर आओ राहुल गांधी, अखिलेश को और फिर दलित और सवर्ण दोनों हिंदुओं को अपनी असली औकात पता लग जायेगी।
तुम्हारी जातिवादी हनक तभी तक है जबतक कि सत्ता एकमात्र हिंदुत्ववादी दल के हाथों में है, उसके बाद दुल्लत ए मीनार भारत में भी बनेंगी क्योंकि फिर गलती सुधारने का मौका तो तुम्हें मिलने से रहा।
—–
Note:- अगर कोई सैद्धांतिक तर्क नहीं है तो व्यक्तिगत टिप्पणी करके मुझे डॉलर कमाने का मौका न दें।✍️ देवेन्द्र सिकरवार
