*अपने भीतर “करुणा” रखिए, “आवेश” नहीं,* *क्योंकि बादलों की “वर्षा” से ही पुष्प खिलते हैं,* *उसकी “गर्जना” से नहीं।* *जिंदगी में ऐसे लोग भी मिलते
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*अपने भीतर “करुणा” रखिए, “आवेश” नहीं,* *क्योंकि बादलों की “वर्षा” से ही पुष्प खिलते हैं,* *उसकी “गर्जना” से नहीं।* *जिंदगी में ऐसे लोग भी मिलते
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हम निःशब्द हैं और काल के इस क्रूर निर्णय😢 से बहुत दुखी हैं। अपनी लोक संस्कृति के लिए अपने अभिनय द्वारा समर्पित हमारे उत्तराखंड की
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सुल्लू : आम तौर पर इसे किसी गमले या कनस्तर में मिट्टी भर कर लगा कर मकान की छत पर रखने से वास्तु दोष दूर
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#प्रेम का स्मारक ताजमहल नहीं यह है.. चित्र में दिखाई गई महिला की फोटो को ज़ूम करके देखेंगे तो उनके गले में पहना हुआ एक
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