11 नवंबर 2004 की वह रात भारतीय इतिहास के पन्नों में एक काले अध्याय के रूप में जानी जाती है, जब दीपावली के पावन त्योहार पर कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को पुलिस ने एक अपराधी की तरह गिरफ्तार कर लिया था। किसी स्थापित हिंदू पीठ के शीर्ष संत की इस तरह की गिरफ्तारी आजाद भारत में अभूतपूर्व थी।
लेकिन साल 2013 में जब पुदुचेरी की अदालत ने शंकराचार्य को सभी आरोपों से ससम्मान बरी किया, तो इस पूरी कार्यवाही के पीछे छिपी राजनीतिक दुर्भावना, षड्यंत्र और सत्ता के दुरुपयोग का सच देश के सामने आ गया। कि कैसे तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता, केंद्र की सोनिया गांधी सरकार की चुप्पी और प्रशासनिक दबाव ने मिलकर एक निर्दोष संत को फंसाने की पटकथा लिखी थी।
इस पूरे घटनाक्रम की मुख्य सूत्रधार तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता थीं। कभी शंकराचार्य के सामने नतमस्तक होने वाली जयललिता अचानक उनके खून की प्यासी क्यों हो गईं ? इसके पीछे राजनीतिक और प्रशासनिक कारण थे। “कानून से ऊपर कोई नहीं” का नरेटिव, जयललिता उस समय अपनी छवि एक आयरन लेडी और सख्त प्रशासक के रूप में पेश करना चाहती थीं। विधानसभा में उन्होंने गर्व से बयान दिया था— “कानून अपना काम कर रहा है और कानून के सामने सब बराबर हैं, चाहे वह कोई आम आदमी हो या धार्मिक गुरु।”
उस वक्त कुछ राजनीतिक विश्लेषकों और नेताओं, जैसे सुब्रमण्यम स्वामी, ने यह दावा भी किया था कि जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले चल रहे थे। यह अफवाह उड़ी थी कि जयललिता ने केंद्र सरकार (सोनिया गांधी) को खुश करने और अपने मुकदमों में राहत पाने के लिए शंकराचार्य को गिरफ्तार करवाया।
शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती उस समय दलितों के उत्थान और धर्म परिवर्तन (कन्वर्ट) रोकने—यानी वापस हिंदू धर्म में लाने—के लिए बहुत बड़े पैमाने पर काम कर रहे थे। कांची मठ के इस काम से दक्षिण भारत में ईसाई मिशनरियों के प्रभाव को चुनौती मिल रही थी। दक्षिणपंथी विचारकों और नेताओं ने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी, जो जन्म से ईसाई थीं, ने वेटिकन और ईसाई मिशनरियों के दबाव या प्रभाव में आकर शंकराचार्य के खिलाफ यह साजिश रची।
विश्व हिंदू परिषद (VHP) के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल और RSS के कई बड़े नेताओं ने सीधा आरोप लगाया था कि शंकराचार्य की गिरफ्तारी के पीछे सोनिया गांधी का हाथ है। उनका दावा था कि सोनिया गांधी के इशारे पर ही तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने यह कदम उठाया है, ताकि हिंदू धर्म और उसकी सबसे बड़ी पीठ को दुनिया भर में बदनाम किया जा सके।
जयललिता पर आरोप थे कि उन्होंने पुलिस को खुली छूट दे रखी थी, ताकि शंकराचार्य की छवि को पूरी तरह ध्वस्त किया जा सके। गिरफ्तारी के समय पुलिस ने जानबूझकर ऐसा तरीका अपनाया, जिससे संत का अपमान हो। यह कोई सामान्य कानूनी कार्यवाही नहीं, बल्कि सत्ता का नग्न प्रदर्शन था।
उस समय केंद्र में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली UPA सरकार थी। दक्षिणपंथी संगठनों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि इस पूरी साजिश के तार दिल्ली से जुड़े थे। शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थे। वे दलित बस्तियों में जाते थे, उनके कल्याण के लिए स्कूल-अस्पताल चलाते थे और बड़े पैमाने पर हो रहे ईसाई धर्म परिवर्तन को रोक रहे थे। सोनिया गांधी, जो जन्म से ईसाई थीं, के केंद्र में आते ही ईसाई मिशनरियों का प्रभाव बढ़ा। आरोप लगे कि सोनिया गांधी के इशारे पर या उनकी मौन सहमति से जयललिता ने यह कदम उठाया, ताकि हिंदू धर्म के इस सबसे बड़े रक्षक को रास्ते से हटाया जा सके और कांची मठ के सामाजिक कार्यों को ठप किया जा सके।
इस पूरी गिरफ्तारी के पीछे की दुर्भावना और राजनीतिक मंशा का सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत भारत के पूर्व राष्ट्रपति और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी के बयान से मिलता है। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘द कोएलिशन इयर्स’ (The Coalition Years) में इस घटना पर जो लिखा, वह इस पूरी साजिश को बेनकाब करने के लिए काफी है।
प्रणब मुखर्जी ने किताब में दर्ज किया है कि जब कैबिनेट की बैठक में शंकराचार्य की गिरफ्तारी की बात उठी, तो वे स्तब्ध रह गए थे। उन्होंने तत्कालीन सरकार और व्यवस्था पर तीखा सवाल उठाते हुए कैबिनेट में कहा था— “क्या देश में धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिज़्म) का पैमाना केवल हिंदू संतों के लिए है ? क्या देश की कोई सरकार दीपावली के पावन दिन पर किसी मुस्लिम मौलवी या ईसाई पादरी को इस तरह बिना किसी पुख्ता सबूत के गिरफ्तार करने की हिम्मत दिखा सकती थी ?”
देश के इतने वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का यह बयान इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि शंकराचार्य के खिलाफ की गई कार्रवाई पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण, दुर्भावना से प्रेरित और हिंदू-विरोधी मानसिकता का हिस्सा थी।
गिरफ्तारी के कुछ समय बाद तमिल की एक मशहूर लेखिका अनुराधा रमणन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके एक बेहद सनसनीखेज आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि 1992 में जब वह एक आध्यात्मिक पत्रिका के सिलसिले में शंकराचार्य से मिलने मठ गई थीं, तब शंकराचार्य ने उनके साथ अमर्यादित व्यवहार करने की कोशिश की थी। इस आरोप को उस समय तमिल मीडिया और विरोधी राजनीतिक दलों ने शंकराचार्य की छवि खराब करने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। समर्थकों का कहना था कि यह पूरी कहानी पुलिस के इशारे पर शंकराचार्य का चरित्र-हनन करने के लिए गढ़ी गई थी।
उस समय सबसे बड़ा विवाद मीडिया ट्रायल को लेकर था। गिरफ्तारी के बाद तमिलनाडु पुलिस लगातार मीडिया को ऐसी कहानियां लीक कर रही थी, जिससे शंकराचार्य की छवि एक धार्मिक गुरु के बजाय एक अपराधी जैसी बने। मीडिया में खबरें चलाई गईं कि शंकराचार्य जेल में रो रहे हैं, वह भागने की फिराक में थे, या उनके पास भारी मात्रा में बेहिसाब नकदी (कैश) और विदेशी मुद्रा है। इस एकतरफा कवरेज के खिलाफ देश के प्रबुद्ध वर्ग और कुछ पत्रकारों, जैसे ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ ने आवाज उठाई और कहा कि बिना दोष सिद्ध हुए एक सम्मानित संत का इस तरह चरित्र-हनन करना पूरी तरह गलत है।
किसी भी मामले में फंसाए जाने का सबसे बड़ा सबूत अदालत का अंतिम फैसला होता है। नवंबर 2013 में पुदुचेरी की विशेष अदालत के जज डी. रामासामी ने जो फैसला सुनाया, उसने तमिलनाडु पुलिस और सरकार के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि अभियोजन पक्ष (पुलिस) शंकराचार्य के खिलाफ एक भी ठोस या कानूनी रूप से मान्य सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा। पुलिस ने जिन गवाहों के दम पर शंकराचार्य को मास्टरमाइंड घोषित किया था, वे सभी 80 से ज्यादा मुख्य गवाह अदालत में मुकर गए। उन्होंने बयान दिया कि पुलिस ने उन पर दबाव डालकर और डरा-धमकाकर गलत बयानों पर दस्तखत करवाए थे। कोर्ट के फैसले से यह साफ था कि यह मामला न्याय की स्थापना के लिए नहीं, बल्कि एक पूर्वनिर्धारित एजेंडे के तहत शंकराचार्य को फंसाने के लिए तैयार किया गया था।
ये सब जान कर भी अब भी यदि हिंदू ऐसे दुर्दांत हिंदू बिरोधियों को वोट देते हैं तो उसे बड़ी मुर्ख संसार में और कुछ भी नहीं हैं।
जय हिंद, भारत माता की जय। साभार
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