हरियाली पूड़ा का सुप्रसिद्ध त्यौहार भारत वर्ष में उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध नन्दादेवी सिद्धपीठ नौटी में मनाया जाता है

बसन्त ऋतु के अवसर पर नन्दादेवी का ‘हरियाली पूड़ा’ त्यौहार
उत्तराखण्ड हिमालय में यहां के जनमानस ने देवी देवताओं के साथ अपने रिश्ते जोडे हैं जिन्हें विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न देवी देवताओं के साथ जोडा गया है हिमालय की देवी नन्दा के नाम से जहां हिमश्रृगों, पर्वतों, नदियों स्थानों के साथ ही यहां के मनुष्यों, पालतू पशुओं के नाम से भी जोडा गया है वहीं वर्तमान में समुद्री जहाजों, ट्रेनों के नाम के साथ ही उपग्रहों के साथ भी जोडने का प्रयास गतिमान है।

नौटी गांव के लोग भगवती नन्दा को अपनी बहिन (ध्यांण) मानते हैं पूरे चांदपुर व श्रीगुर परगने को भगवती नन्दा का मायका माना व समझा जाता है पर्वतीय परम्परा के अनुसार चैत्र माह में गांव के लोग पहले भगवती नन्दा को बहिन मानते हुये आलू कलेउ भेंटुली देते हैं। यहीं से गढवाल के राजा ने भगवती नन्दा को 12 वर्ष के बाद मायके से ससुराल (कैलाश) भेजने की परम्परा प्रारम्भ की थी जिसे अब गढवाल के राजवंशी कांसुवा गांव के राजकुंवर निभाते हैं, राजा द्वारा प्रारम्भ भगवती नन्दा की इस महायात्रा को श्री नन्दादेवी राजजात कहा जाता है इस यात्रा में गढवाल एवं कुमाउ के 500 से अधिक देवी देवता भगवती नन्दा को कैलाश भेजने के लिये शामिल होते हैं।
हरियाली पूड़ा का सुप्रसिद्ध त्यौहार भारत वर्ष में एक मात्र उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध नन्दादेवी सिद्धपीठ नौटी में मनाया जाता है। प्राचीन परम्पराओं के अनुसार चैत्रमास की संक्रान्ति के दिन नौटी के प्रत्येक घर में हरियाली पड़ती है। घरों में 9 दिन तक उनकी पूजा होती है और नवें दिन गाँव की सौभाग्यवती बहुर्गे, लड़कियां हरियाली को पूड़ों के पत्तों पर रखती हैं, हरियाली के इन पूड़ों को रिंगाल की टोकरी (डामी) पर पूजा सामग्री नैवैद्य और भेंट सहित रखा जाता है।

गाँव की महिलायें पूरे श्रृंगार के साथ सिरों में हरियाली पूड़ों की डालियां बाजे-गाजे के साथ घरों से निकल कर नन्दादेवी के सिद्धपीठ में पहुँचती हैं यह दृष्य बड़ा मनोहारी होता है प्रत्येक परिवार की ओर से भगवती नन्दा देवी की पूजा-अर्चना होती है। हरियाली के पूड़े नन्दादेवी को चढ़ाये जाते हैं। यह त्यौहार हरियाली पूड़ा के नाम से प्रसिद्ध है। इस अवसर पर यहाँ पर बहुत बड़ा मेला लगता है उस दिन हरियाली ही प्रसाद के रूप में दी जाती है।

इस वर्ष यह त्यौहार 23 मार्च को सम्पन्न हो रहा है। श्रीमद्भागवत में इस पूजा का विद्यान है। मन्त के प्रथम मास में नंदनीय कुमारियों के द्वारा सम्पन्न किया गया है जिसमें पूजा द्रव्यों की विभिन्नता होने पर भी प्रमुख पूजा द्रव्य फलप्रवालाकुवंर था। श्रीमद्भागवत स्कन्ध 10 अध्याय 22 श्लोक-31 नौटी में यह पूजा वसन्तीय मास में चैत्र माह की 9 गते को मनाया जाता है इसका चैत्र नवरात्रि से कोई सम्बन्ध नहीं है। भगवती नन्दादेवी का पूजन अंकुर से होता है इसका महत्व यह है कि बीच से अंकुर और अंकुर से बीज यह परस्पर सम्बन्ध अनाधिकाल से इस कार्य कराव भाव का प्रचलन है। इसका मूल अर्थ कि बीज आद्य शक्ति है जिसका अंकुर जगत है, अर्थात् कारण शक्ति और कार्य जगत है, यह देवशक्ति है। नन्दा जिसकी आराधना ही आज के करालकनीकाल में सर्व-सुख सम्पत्ति को देने वाली है, और साथ ही दुख दरिद्रता को नाश करने वाली है। इसकी उपासना के विभिन्न प्रकार विभिन्न जातियां, समाज और धर्म में प्रचलित है। उन्हीं में से नौटी गाँव में प्रतिष्ठ नन्दापीठ श्री मेरू प्रसार श्रीयंत्र सिद्धपीठ में भी यह एक परम्परागत पूजा पद्धति है।

अतः अपने जीवन को सुखमय बनाने तथा देश, जाति, धर्म और जीवन व्यक्ति को उन्नत तथा बचाने के लिए सिद्धपीठ नन्दा की यात्रा दर्शन और पूजन प्रत्येक अपने धैर्य प्रेम के इच्छुक व्यक्ति को आज के युग में अवश्य करनी चाहिए। कलयुग में इस शक्ति को ही महत्ता दी गयी है। उत्तराखण्ड में विशेषकर गढ़वाल क्षेत्र में यह रिवाज है कि चैत्र के महीने लोग अपने घर की विवाहित कन्याओं (ध्याण) को कुछ न कुछ अवश्य भेंट देते हैं जिसे चैत्र के महीने का आलु (कलेऊ) कहा जाता है। नौटी गाँव के निवासी भगवती नन्दा को अपनी ध्याण समझते हैं और इसी लिये चैत्र की 9 गते को हरियाली के साथ नन्दादेवो को भेंट चढ़ाते हैं।

स्कन्ध कालिका आदि पुराणों यथा यन्त्राचूड़ामणि आदि ग्रन्थों में शक्तिपीठों की परम्परा निर्दिष्ट है। इसके अनुसार एकावन वर्ष सभामनाय के आश्रम आदि शक्ति भगवती जगदम्बा की उपासना के एकावन जागृति केन्द्र शक्तिपीठ के नाम से सम्पूर्ण भारत में उपस्थित है। सम्पूर्ण देश की धार्मिक एकता का श्रेष्ठ परीज्ञान इन शक्ति-पीठों के माध्यम से होता है। एक ओर कैलाश (हिमालय) पर भगवान शंकर का वास है तो दूसरी ओर सुदूर कन्याकुमारी से प्रायः सर्वत्र व्याप्त शक्तिपीठों के रूप में भगवती जगदम्बा का निवास है। एकावन शक्तिपीठों में श्री सिद्ध शक्तिपीठ श्री नन्दादेवी नौटी की गणना भी है। ऐसा कहा जाता है कि शिवजी द्वारा सती का एक अंग

का हिस्सा चाँदपुरगढ़ी (गढ़वाल राज्य की प्रथम राजधानी) में गिरा था जिससे राजा ने यन्त्र के रूप में राजधानी के पास ही नौटी ग्राम में यंत्र रूप में प्रतिष्ठित किया जिसे आजतक सिद्धपीठ नन्दादेवी के रूप में पूजा जाता है।

सिद्धपीठ के चबूतरे पर मन्दिर नहीं होता है चबूतरे के ऊपर न मूर्ति होती है, न ही मन्दिर का छावा। चबूतरे के ऊपर एक शिखा पर स्वास्तिक का चिन्ह अंकित होता है जैसा कि भूमिगत यंत्र में होता है। नौटी के नन्दादेवी सिद्धपीठ में श्री षोडसी मेरू प्रसार यन्त्र अप्रैल 74 में प्रतिष्ठित हुआ जिसका वर्णन शिवपुराण रूद्र संहिता तृतीय अध्याय शिवअवतार प्रसंग से निम्न प्रकार से आया है।

“श्री विधेशः षोडशाहः श्री विद्या षोडसी मत”। अर्थात श्री शंकर का श्री विधेश (षोडश) नामक अवतार है और शक्ति श्री विद्या (षोडसी) है। इसी प्रकार शिवातार सुखदों इयपृमो बगलामूखः शक्तिस्तम्भ महानन्दा विख्याता बंगलामुखी (शिवरूद्र सविताः अध्याय 17 श्लोक १) अर्थात् शिव का आठवां अवतार सुखद (वगला मुख) और उसकी शक्ति महानन्दा (वगलामुखी) है। इससे नन्दापीठ प्राचीन व सिद्धपीठ है। यही बात दुर्गा सप्तसती में नन्दगोपग्रह जतियशोदा गर्भसम्भवा नन्दादेवी विख्याता तवमेव वाम भविष्यिति से वर्णन आया है। द्वापर में नन्द के घर में यशोदा से जन्मी वह कन्य जिसे कंस ने कृष्ण के बदले पटकना चाहा था, वही कन्या नन्दादेवी चण्डिका और गौरी कहलाई। ऋषिकेश में नौटियाल आदि जातियों के पूर्वजों और नन्दादेवी की प्राचीन जन्मभूमि होने से इनमें आज भी भाई-बहिनों का रिस्ता लगाया जाता है। ऋषिकेश में माया से ऋषिकेश वासी हिमन्त ऋषि के घर में गौरी नाम से नन्दादेवी जन्म हुआ। शिवजी का विवाह नन्दादेवी से हुआ ओर ऋषिकेश में ही रहने लगे। वहां के निवासियों के व्यंग वचनों से रूष्ट होकर शिवजी नन्दा सहित कैलाश की ओर चल दिये। इसी बीच ऋषिकेश के नौटियाल आदि प्रमुख ब्रह्मण जातियां राजा के साथ चाँदपुरगढ़ी के आसपास नौटी आदि गाँवों में बस गई थी, नौटियाल राजगुरू थे। शिवजी के साथ नन्दादेवी नौटी के पास आई तो उसे ध्यान आया कि मेरे भाई-बहिन नौटी में रहत हैं अतः व्यभोक्ति भय से शिवजी तो शैलेश्वर चले गये किन्तु भगवती नंदादेवी नौटी में आई। इसे उसने ऋणसि (ऋषिकेश) ठहराया।

नन्दादेवी गढ़वाल के राजा की ईष्टदेवी होने के कारण राजराजेश्वरी नन्दादेवी कहलायी। राजा के द्वारा प्रति 12वें वर्ष नौटी से शिवजी के कैलाश तक नंदादेवी यात्रा का विधान किया जिसे राजजात (राजा की यात्रा) कहा जाता है। राजगुरू नौटियाल नन्दादेवी के पुजारी हैं। कांसुवा के राजवंशी कुंवर और राजगुरू नौटियाल आदि जातियां इस परम्परा को बनाये हुए हैं। अभी 1968 में नन्दादेवी राजजात हुई जिसका भारत सरकार की ओर से फिल्मीकरण हुआ था आगामी यात्रा 2027 के लिए केंद्र व राज्य सरकारे ढांचागत वयवस्थाओ के सृजन में जुटी हुई है

नन्दादेवी राजजात के अपने कुछ नियम हैं जिसका उल्लघन भयावह होता है। जिनका 14 शताब्दी के कन्नौज के राजा जसधवल के यात्रादल के अवशेष आज भी 16200 फुट की ऊँचाई पर स्थित रूपकुण्ड में अपनी दर्द-नाक कहानी सुना रहे हैं। नौटी में गाये जाने वाले लोकगीतों के आधार पर नन्दादेवी और राजजात पर शोध कार्य हो सकता है।

हिमालय से लगे हुए सीमान्त जनपद चमोली के प्रसिद्ध नन्दाधाम नौटी तक पहुँचने के लिए कोटद्वार, हरिद्वार काठगोदाम तक रेल और उसके बाद कर्णप्रयाग व नौटी तक एक दिन का बस का सफर है । इस वर्ष हरियाली पूड़ा मेला 15 से 23 मार्च तक आयोजित किया गया है मेले में खेलकूद सांस्कृतिक प्रतियोगियायें आयोजित की गई हैं संयोग से मेले के दौरान दिनांक 19 से 27 मार्च तक मन्दिर में नव संवत्सर व चैत्र नवरात्री पूजा भी है