मोदीजी की लगातार चल रही ‘नॉट आउट’ पारी और विपक्ष की ‘गुगली’ डालने की नाकाम कोशिशों को देखते हैं, तो एक तरफ दूरदृष्टि का आसमान नजर आता है और दूसरी तरफ बेचैनी की गहराती खाई, क्या ‘यूजीसी’ सरकार के गले में मछली के कांटे की तरह फंस गया!!, देहरादून में हाईटेक नकल गैंग का भंडाफोड़ 10 लाख था रेट, कुख्यात  विक्रम मूल रूप से उत्तराखंड का ही रहने वाला था, आज का पंचाग आप का राशिफल

यदि #UGC_अधिनियम मोदी जी के निर्देश पर या अनुमति से होता,तो आप उन्हें ब्लेम कर सकते थे। हलांकि यूजीसी सरकार के गले में मछली के कांटे की तरह फंस गया है। सरकार स्वयं नहीं समझ पा रही है कि दिग्विजय सिंह द्वारा फंसाये गये इस यूजीसी के कांटे से निबटा कैसे जाय। देखा जाय तो यूजीसी कमेटी के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह इस प्रकरण में मोदी सरकार को लपेटे में लेने में सफल रहे हैं। 

यहां निर्देश या अनुमति पर जोर है क्योकि सभी कार्यो एवं घटनाओ के लिए सरकार ही जिम्मेवार होती है, चाहे वह आतंकी हमला ही क्यों ना हो या फिर भारत पर टैरिफ। आपको यह देखना होता है कि उस हमले के पश्चात क्या किया गया?या फिर,टैरिफ से कैसे निपटा गया। 

जैसा कि हम निरंतर लिखता आ रहे हैं कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि अधिनियम सरकार की स्वीकृति से जारी हुआ है। ना ही अधिनियम में ऐसा लिखा है। 

कारण यह है कि UGC एक statutory बॉडी है,ठीक वैसे ही जैसे RBI है। 

अगर आप दोनों संस्था के अधिनियम पढ़ेंगे,तो लिखा रहता है कि अधिनियम उन्होंने स्वयं को प्रदत्त शक्तियों के आधार पर जारी किया है। 

कुछ केसेस में जहाँ केंद्र सरकार से RBI अनुमति लेता है,तो अधिनियम में लिखता है कि “केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से” जारी किया जा रहा है। 

फिर भी,आपको यह देखना है कि सरकार ने इस अधिनियम से कैसे निपटा है।जैसे ही यह नोटिस में आया,इस पर कोर्ट ने स्टे लगा दिया है।वैसे अब इस पर इंतजार है तो सरकार के अपना पक्ष रखने का है पर सरकार भी समय ले रही क्योंकि वह राजनीतिक असंमजस में है क्योंकि अगर वह अपने कर्तव्यों का पालन करती है तो वह किसी भी एक के पक्ष में नहीं रह सकती उसको उचित बैलेंस बनाकर सभी को साथ लेकर ही चलना है क्योंकि अब चुनावी युद्ध बहुत हाईटेक हो गया और मोदी विरोधी हर टूलकिट का उपयोग मोदी के विरोध में करते हैं। अनेक झूठे नरेटिव भी गढे जाते हैं। लेकिन यह भी सच है माना मोदी सरकार तक यूजीसी पर कोर्ट का स्ट हैहै। लेकिन कभी कांग्रेस गठबंधन आ गया तो वो स्टे वैकेट भी करा देगा जैसे दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में यूजीसी अधिनियम बन गया। इसलिए इस विभेद कारी जातिवादी अधिनियम को वापस लेने में ही मोदी सरकार की सफलता व समझदारी है।

हम तो कह रहे हैं कांग्रेस द्वारा बनाये गये सभी जातीय विभेदक और नमाजवादी विसंविधान मोदी सरकार समाप्त करे ताकि समता मूलक समाज बनाने के लिए यह आवश्यक है। संविधान में जातीय विभेद रहेगा तो जातिवाद का जहर जातीय विभेद समाप्त होगा कैसे!! 

दोनों “प्रकार” के अधिनियम की कॉपी लगा रहे हैं।

जब हम मोदीजी की लगातार चल रही ‘नॉट आउट’ पारी और विपक्ष की ‘गुगली’ डालने की नाकाम कोशिशों को देखते हैं, तो एक तरफ दूरदृष्टि का आसमान नजर आता है और दूसरी तरफ बेचैनी की गहराती खाई।

साल 2001 में जब नरेंद्र मोदी ने गुजरात की कमान संभाली, तब विरोधियों को लगा था कि ये एक नया चेहरा है, कुछ तेज गेंदें आएंगी और कहानी खत्म हो जाएगी। लेकिन उन्होंने ऐसी पिच तैयार की कि जो भी चाल चली गई, वही चाल चलने वाले पर भारी पड़ गई।

2002, 2007 और 2012—हर चुनाव में उन्होंने ऐसा प्रदर्शन किया मानो हर बार नया रिकॉर्ड बनाना ही लक्ष्य हो, और विपक्ष स्कोरबोर्ड देखने के अलावा कुछ कर ही नहीं पाया।

गुजरात में विरोधियों की हालत उस दर्शक जैसी हो गई थी जो हर ओवर में विकेट की उम्मीद करता है, लेकिन मैच खत्म होने पर उसे मजबूरी में तालियां बजानी पड़ती हैं।

जब मोदीजी ने राज्य की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय मंच पर कदम रखा, तो विरोधी दलों ने मिलकर ‘महागठबंधन’ की ऐसी थाली सजाई जिसमें स्वाद से ज्यादा असंतुलन था। 2014 में ‘गुजरात मॉडल’ की लहर इतनी तेज चली कि कई बड़े चेहरे मैदान में खुद को संभाल ही नहीं पाए।

मोदीजी की खासियत यही रही कि उन्होंने खुद को रफ्तार से आगे बढ़ाया और विपक्ष को वहीं खड़ा छोड़ दिया, जैसे कोई तेज रफ्तार ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़े यात्रियों को पीछे छोड़ जाती है।

तब से लेकर अब तक हालात ऐसे बने कि विपक्ष तैयारी करता रहा, लेकिन हर बार सवाल कुछ और ही सामने आ गया—और जवाब उनके पास नहीं था।

लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहने के बाद अब विरोधियों की बेचैनी सिर्फ राजनीतिक असहमति तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह आक्रामकता में बदलती नजर आती है। जब तर्क कम पड़ जाते हैं, तब लोग अलग-अलग तरीकों से ध्यान खींचने की कोशिश करते हैं।

लोकतंत्र के मंच पर शोर मचाना वैसा ही है जैसे स्थिर लौ को बुझाने की कोशिश करना, जबकि वह जनता के भरोसे से लगातार प्रज्वलित हो रही हो।

संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को निशाना बनाना भी उसी अधीरता का संकेत है, जिसे हार के बाद संभालना आसान नहीं होता।

इतिहास गवाह है कि चाहे विरोध कितना भी बड़ा क्यों न रहा हो, मोदीजी ने हर चुनौती को अपने तरीके से संभालकर आगे बढ़ने का रास्ता बनाया है।

एक तरफ आवाज उठती रही—“हम आंदोलन करेंगे”

और दूसरी तरफ जवाब आया—“हम विकास को आगे बढ़ाएंगे”

कहीं सवाल उठे—“मशीनों पर भरोसा नहीं”

तो जवाब मिला—“जनता के घर तक सुविधा पहुंचाना ज्यादा जरूरी है”

विपक्ष आज भी पुराने मुद्दों की चादर ओढ़े घूम रहा है, जबकि जनता अब नतीजे देखना चाहती है, सिर्फ बातें नहीं।

मोदीजी का लगातार आगे बढ़ना सिर्फ चुनावी सफलता नहीं, बल्कि उस सोच पर जवाब है जो देश को अस्थिर देखना चाहती है।

आज जब कई दल लंबे समय से सत्ता से दूर हैं, तो उनकी बेचैनी स्वाभाविक है, लेकिन यह भी सच है कि देश का भविष्य केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि दिशा और निर्णय से तय होता है।

सतर्क रहना जरूरी है, क्योंकि राजनीति में कई बार शोर ज्यादा होता है और सार कम, लेकिन सामने वह नेतृत्व है जो हर चुनौती को अवसर में बदलने का हुनर रखता है।

और शायद यही वजह है कि यह पारी अभी भी जारी है—‘नॉट आउट’, आत्मविश्वास के साथ, और अगले लक्ष्य की ओर बढ़ती हुई।

देहरादून में हाईटेक नकल गैंग का भंडाफोड़, 10 लाख था रेट; दो आरोपी गिरफ्तार प्रतियोगी परीक्षाओं में नकल कराने के अब तक के सबसे हाईटेक तरीके का राजधानी देहरादून में पर्दाफाश हुआ है।

उत्तराखंड एसटीएफ और उत्तर प्रदेश एसटीएफ की संयुक्त कार्रवाई में सेवा चयन आयोग (एसएससी) मल्टी टास्किंग (नान-टेक्नीकल) स्टाफ एवं हवलदार भर्ती परीक्षा-2025 के दौरान रिमोट एक्सेस के जरिये प्रश्नपत्र हल कराने वाला गिरोह बेनकाब हुआ है।

इस परीक्षा के लिए भूमिगत सर्वर रूम बनाकर उसे सेफ्टी टैंक का रूप दिया गया था। यह सेटअप सर्वर की तरह काम कर रहा था और अभ्यर्थियों के कंप्यूटर को रिमोटली एक्सेस कर प्रश्न हल किए जा रहे थे।

एसटीएफ ने दो आरोपितों को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह प्रत्येक अभ्यर्थी से 10-10 लाख रुपये लेकर पास कराने का सौदा करता था।

पुलिस महानिरीक्षक एसटीएफ नीलेश आनंद भरणे ने शनिवार को पत्रकार वार्ता में बताया कि महादेव डिजिटल जोन के एमकेपी इंटर कालेज देहरादून स्थित परीक्षा केंद्र पर शनिवार को छापा मारा गया था।

परीक्षा लैब के पास बने यूपीएस रूम में 24 गुणा 24 इंच का भूमिगत चैंबर बनाकर उसमें दो लैपटाप, राउटर और लीज लाइन कनेक्शन छिपाया गया था। ऊपर से ढक्कन लगाकर इसे सेफ्टी टैंक जैसा रूप दे दिया गया था।

उत्तराखंड का मूल निवासी था कुख्यात 
विक्रम मूल रूप से उत्तराखंड का ही रहने वाला था उसके पिता नौकरी के लिए झारखंड गए थे। झारखंड में विक्रम पर सात से अधिक मुकदमे दर्ज थे हिंदुस्तान अखबार में छ्पी एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में जब झारखंड पुलिस ने उसे यहां से गिरफ्तार किया था तब पहली बार उसका दून कनेक्शन सामने आया था। जमानत पर छूटने के बाद उसने फिर से दून का रुख किया। इस बार भी दून पुलिस की लोकल इंटेलिजेंस सोती रही हैरानी की बात यह है कि झारखंड का गैंगस्टर दून में स्टोन क्रशर का लाइसेंस लेकर कारोबार कर रहा था🤔🤔🤔🤔🤔