UGC अर्थात् यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का नया सर्कुलर खूब चर्चा में है। भाजपा जातीय समीकरण के लिए बांटो और राज करो हेतु UGC नियम लायी है लेकिन भाजपा के हर नियम का सड़कों पर विरोध करने वाली कांग्रेस इस पर चुप्पी साधे हुए है। यानी इस मुद्दे पर दोंनो एक ही हैं।
https://www.facebook.com/share/r/1CRHbgtsq5/
इस पर अनेक पक्ष पढ़े, नोटिस भी पढ़ा। दोनों पक्ष समझने का प्रयास किया। साथ ही लोगों का वह मंतव्य भी जाना जिसमें लोग चाहते हैं कि भारत में जातीय विभेद और मजहबी कानूनों की जगह समान नागरिक संहिता लागू हो। और यूजीसी भी जातिवादी मानसिकता और प्रावधानों की जगह छात्रों को अधिकतम सुविधा दे।
https://www.facebook.com/share/r/14VnB3bvZsz/
साधारण शब्दों में-
यूजीसी भारत के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों की देखरेख करता है।
यह तय करता है कि कौन-सा कॉलेज/यूनिवर्सिटी मान्यता प्राप्त है और यूनिवर्सिटीज़ को सरकारी अनुदान (फंड) देता है। शिक्षा की क्वालिटी और स्टैंडर्ड बनाए रखने के नियम बनाता है। प्रोफेसर बनने के लिए NET परीक्षा भी UGC के अंतर्गत आती है।
https://www.facebook.com/share/r/1ATMwzAkAQ/
नए नियम या गाइडलाइन के तहत कुछ रिजर्व्ड श्रेणी के विद्यार्थी आदि का शोषण या भेदभाव ना हो इसलिए कुछ नए नियम जोड़े है। नए नियम जनरल श्रेणी के हित में नही होते दिख रहे है और सारी कलेश इसी बात पर है।
सरकार के एक नेता जी या शायद वो मंत्री जी भी है- उन्होंने सोशल मीडिया पे इस पे बयान दिया तो लोगों ने उनके बयान की ना केवल धज्जियां उड़ा दी बल्कि ये भी साबित कर दिया कि उक्त के बच्चे तो विदेशों में पढ़ रहे है।
इस नए क़ानून पर एक कोण ये भी बताया जा रहा है कि विपक्ष ने ये सब कारस्तानी रची है और इस नियम बनने वाली कमिटी के मुखिया भी उनके दल के है। यदि ऐसा है तो सत्ता में बैठे लोग क्या झक मार रहे हैं?
https://www.facebook.com/share/r/1F84wS5Pbb/
खैर- इस नियम पर बहुत कुछ कहा सुना पढ़ा जा चुका है- इस पे कुछ नया क्या ही कहा जायें।
जनरल क्लास को अब तक आदत हो जानी चाहिए कि पक्ष हो विपक्ष हो अलाना पार्टी हो फलाना पार्टी हो-
सब का ध्येय केवल वोट बैंक साधना है, इस से अधिक कुछ नहीं।
अगर वाकई Education Reform लाने की नीयत होती, तो करने को बहुत कुछ था। मसलन—
दुनिया की कई शीर्ष यूनिवर्सिटीज़ में “Maximum Time to Degree” का नियम होता है। #अमेरिका में (Stanford जैसी यूनिवर्सिटीज़ सहित) डिग्री के लिए अधिकतम समय तय होता है, भले ही वह प्रोग्राम-specific और कुछ हद तक flexible हो।
#ब्रिटेन में (Cambridge जैसे संस्थानों में) सिस्टम और भी ज़्यादा time-boxed है—ख़ासकर मास्टर्स और PhD में। अनंतकाल तक डिग्री खींचना संभव नहीं।
क्या UGC कभी पूरे देश के सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए ऐसा स्पष्ट ‘Maximum Time to Degree’ नियम बनाएगा कि तीन साल की डिग्री हो तो अधिकतम पाँच-छह साल, उसके बाद न अनुदान, न छात्रवृत्ति, न आरक्षण लाभ—सिर्फ़ पढ़ाई पूरी करने का दबाव।
https://www.facebook.com/share/r/14XTRL1Zg2i/
UGC के CBCS फ्रेमवर्क में 75% अटेंडेंस का प्रावधान मौजूद है, लेकिन उसका पालन विश्वविद्यालय-दर-विश्वविद्यालय ढीला-कड़ा होता है। प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ इसे सख़्ती से लागू करती हैं, सरकारी संस्थानों में अक्सर यह नियम काग़ज़ों तक सिमट जाता है।यूजीसी ने इस पर कभी विचार किया कि इस मुद्दे पे विधार्थी की एकाउंटेबिलिटी निर्धारित हो?
विदेशी विश्वविद्यालयों—Stanford, Cambridge आदि—में शोषण, भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ कड़े नियम हैं, लेकिन वे जाति या नस्ल आधारित रियायतों से अधिक equal standards, due process और accountability पर टिके होते हैं। वहाँ नीति का केंद्र बिंदु यह होता है कि छात्र समय पर, गुणवत्ता के साथ डिग्री पूरी करे।
https://www.facebook.com/share/r/1C8BAPzM6m/
विडंबना यही है कि भारत में शिक्षा नीति का विमर्श आज भी कास्ट मैनेजमेंट के इर्द-गिर्द घूमता है, न कि
• learning outcomes
• accountability
• time-bound degrees
• और global competitiveness के इर्द-गिर्द।
जब तक शिक्षा को वोट बैंक नहीं बल्कि nation-building tool की तरह नहीं देखा जाएगा, तब तक हर नया सर्कुलर किसी न किसी वर्ग को नाराज़ करेगा—और सुधार नाम की चीज़ सिर्फ़ बहसों में जिंदा रहेगी।
https://www.facebook.com/share/r/161Sx6ukbn/
वास्तविक सुधार वहाँ से शुरू होगा जहाँ सभी के लिए नियम एक हों, समय की कीमत तय हो, और डिग्री केवल कागज नहीं अपितु क्षमता का प्रमाण बने। भारत से जातिवादी नमाजवादी विसंविधान हटाकर समान नागरिक संहिता लागू करो : यूजीसी प्रत्येक पीएचडी करने वाले को एक लाख रू प्रतिमाह छात्रवृति दे और ढाई वर्ष में डिग्री अवार्ड अनिवार्य करे । प्रत्येक पीएचडी वाले व्यक्ति को रोजगार देना सरकार सुनिश्चित करे या आजीवन एक लाख रू प्रतिमाह भत्ता अनिवार्य करे।
देहरादून के उत्तरांचल विश्वविद्यालय के सवर्ण छात्र अक्षत शुक्ला की आत्महत्या का मामला अत्यंत संवेदनशील और गंभीर समस्या है एक सभ्य समाज के लिए । यह मामला न केवल एक ब्राह्मण छात्र के जीवन की क्षति है, बल्कि यह शैक्षणिक संस्थानों में होने वाले सवर्ण वर्ग के छात्र छात्राओं के भेदभाव के जटिल स्वरूपों को भी रेखांकित करता है।
https://www.facebook.com/share/p/1778Dymuqj/
अक्षत शुक्ला के पिता के अनुसार उनके बेटे के college में पढ़ने वाला मजहबी धूर्त अयान अली खान शांत- शिष्ट रहने वाले अक्षत शुक्ला को उसकी जाति और धर्म के कारण दुर्व्यवहार किया करता था! शिखा, जनेऊ, तिलक और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अक्षत शुक्ला की मज़ाक बनाई !
क्योंकि मजहबी धूर्त अयान अली खान अपराधी प्रवृत्ति के साथ-साथ रसूखदार था तो इस मामले को गंभीरता से विचार नही किया गया और सवर्ण वर्ग से आने वाले अक्षत शुक्ला की आत्महत्या को ठंडे बस्ते में डालने का कुत्सित प्रयास किया गया!
सवर्ण छात्र अक्षत शुक्ला का मामला स्पष्ट रूप से Institutional Harassment का उदाहरण है। शैक्षणिक संस्थानों की यह जिम्मेदारी है कि वे एक ऐसा वातावरण तैयार करें जहाँ किसी भी छात्र को उसकी धार्मिक या जातीय पहचान चाहे वह किसी भी समुदाय से हो के कारण असुरक्षित महसूस न करना पड़े। ना कि यूजीसी जैसा सवर्ण विरोधी मानसिकता वाला कानून बनाकर जातिवादी अराजकता फैलाने का कार्य करे!
सवर्णों के बल पर सत्ता में बैठे kalnemiyo को सवर्णों के आत्महत्या से क्या ही फर्क़ पड़ने वाला, इनके लिए तो सवर्ण ही अपराधी घोषित कर दिए गए हैं बाकी वर्ग/ मजहब वाले निरपराध !
नेताओं के दरबारी भी सवर्ण वर्ग से आने वाले अक्षत शुक्ला के हत्यारे हैं क्योंकि इन्हें सवर्णों का शोषण-दमन करने वाला यूजीसी कानून का समर्थन करना हैं ताकि गुलामी का सर्टिफिकेट सरकारों से प्राप्त होती रहे समय समय पर!
सवर्णों !
भ्रष्ट निर्लज्ज system से लड़ाई लड़ो, आत्महत्या तो बिल्कुल भी नही करें !सभार
सभी लेख फोटो और लिंक शोशल मीडिया फेसबुक से लिया गये हैं निम्न लिंक में प्रतिक्रिया देते हुए राकेश मिश्रा लिखते हैं –
https://www.facebook.com/share/r/1C8BAPzM6m/
#UGC मुद्दे पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकीलों से सलाह ली, सबका एक ही मत था कि इसमें जनरल कास्ट वाला ना तो कोई शिकायत कर सकता है और ना ही फर्जी शिकायत करने वाले पर कोई एक्शन ले सकता है, मने जनरल कास्ट सीटिंग डक है….
इसके बाद मैने कुछ माननीय न्यायाधीशों से सलाह ली, उनका भी स्पष्ट कहना था कि यह गाइडलाइन है, और गाइडलाइन लॉ (कानून) के प्रकाश में पढ़ी जाएगी और यदि कानून (एक्ट) नहीं है तो संविधान के प्रकाश में पढ़ी जाएगी, क्योंकि यह SC ST OBC के डिस्क्रिमिनेशन का मामला है तो इसे SCST (Prevention of Atrocities) Act के प्रकाश में पढ़ा जाएगा और ऐसे में Opressor सवर्ण ही होगा दलित नहीं, यानी UGC सिर्फ सवर्ण पर लागू होगा, यदि यह कानून नहीं भी होता तब भी इसे संविधान के प्रकाश में पढ़ने पर भी पीड़ित दलित को ही माना जाता ना कि सवर्ण को, इसलिए UGC सिर्फ सवर्णों के खिलाफ ही लगेगा, इसमें सवर्णों के शिकायत करने की कोई जगह नहीं है ….
जैसा कि एक पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता,नेता, वा पेड कार्यकर्ता फ़ायदे गिना रहे हैं, उन्हें भी असलियत पता है पर पद और पार्टी की नीतियां उन से यह सब करवा रही है, कुछ लोगों को मैने फोन भी लगाए उनका फोन ना उठाना इसका सबूत है, वे भोले नहीं है, बल्कि अत्यधिक चालाक हैं, वे अपने फायदे के लिए आपके बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं, वे अपने बच्चे पालने के लिए आपके बच्चों को नर्क में धकेलने को तैयार हैं, बड़ी ही गजब की मानसिकता है
खैर हम तो कहते हैं हम गलत है, और भगवान करे ऐसा ही हो, आप तो जहां जहां SC/ST/OBC लिखा है वहां वहां SC/ST/OBC/Gen लिखवा दो या फिर SC/ST/OBC हटवा कर स्टूडेंट्स लिखा दो, या फिर सरकार या UGC से इस पर क्लैरिफिकेशन लिखवा दो कि इसमें सवर्णों को भी शिकायत का अधिकार है, आप हमे गलत साबित कर दो हम आपका फ्री गुणगान करेंगे, जैसा 11 सालों से करते आए हैं, हम अपने बच्चों को इस गाइडलाइन में जिंदा जलते नहीं देखना चाहते बस इतनी सी बात है …
https://www.facebook.com/share/v/1C1PwKcLnU/
बाकी इतना सा निवेदन है कारण जो भी हो झूठ बोल कर कम से कम नजरों में मत गिरो, अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सत्यानाश मत करो, बाकी आपकी मर्जी, होय वही जो राम रची राखा .जय श्री राम
महान हिंदुनिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन UGC गजट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँच चुके हैं, लेकिन करोड़ों छात्रों से जुड़े इस गंभीर विषय पर सुनवाई दो महीने बाद रखी गई है — यह अपने आप में बहुत कुछ कहता है।
सच यह है कि UGC के ये नियम 13 जनवरी से देश की शैक्षणिक संस्थाओं में लागू हो चुके हैं, फिर भी सरकार, मंत्रालय, PMO और मीडिया — सब चुप हैं।
इतना बड़ा निर्णय और इतना बड़ा जनाक्रोश… फिर भी सुनियोजित ब्लैकआउट।
जो सत्ता मंचों पर सनातन का प्रदर्शन करती है, वही सत्ता नीतियों में समाज को तोड़ने वाले नियम थोप रही है।
यह लापरवाही नहीं…
यह नीति है।
अब चुप्पी नहीं —अब जवाब चाहिए।
Adv. Anil Mishra #जयश्रीराम
वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिन्हा ने भी सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने भी यूजीसी रेगुलेशन्स 2026 को हटाने की मांग की है। मैं इसलिए इनका धन्यवाद करता हूँ क्योंकि सुशांत सिन्हा जी का पाठशाला खुद प्रधानमंत्री मोदी भी देखते हैं और यह बात सार्वजनिक है। यानी उन्होंने मोदी की गुड बुक में होने के बाद भी मोदी की नीति का विरोध किया। ऐसा ही साहस हर वरिष्ठ पत्रकार को दिखाना पड़ेगा। ये सिर्फ सामान्य वर्ग की बात नहीं पूरे हिन्दू समाज की एकता का प्रश्न है। टिप्पणी करके बताए आपने और कौन कौन से वरिष्ठ पत्रकारों को अभी तक चुप्पी साधे हुए देखा है
