ईरान में फांसी,विरोध और वैश्विक टकराव: क्या यह स्थिति किसी बड़े संकट की ओर बढ़ रही है?
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एक समाचार के अनुसार 18 दिनों से जारी विरोध प्रदर्शन में अब तक बारह हजार मुसलमानों का वहां की मुस्लिम सरकार नरसंहार कर चुकी है। जबकि वहां लोगों की भीड़ ने इस्लाम मानने से मना कर दिया है और तीन सौ पचास मस्जिदों को जला कर राख कर दिया है।
ईरान में जारी हिंसक विरोध प्रदर्शन अब केवल एक घरेलू असंतोष का प्रकरण नहीं रह गया है। प्रदर्शनकारी इरफान सुलतानी को संभावित रूप से फांसी दिए जाने की खबरों ने इस संकट को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है।
एक तरफ़ सड़कों पर जनता का गुस्सा है,दूसरी तरफ़ सरकार की सख़्त कार्रवाई और तीसरी ओर अमेरिका तथा इज़राइल से जुड़ा बढ़ता वैश्विक दबाव। यह सवाल अब ज़्यादा अहम हो गया है क्या ईरान हालात पर काबू पा रहा है या हालात ईरान को नई दिशा में धकेल रहे हैं?
*ईरान में 18 दिनों से जारी इस्लामिक शाशन के विरोध प्रदर्शन में अब तक बारह हजार मुसलमानों का वहां की कट्टरपंथी सरकार नरसंहार कर चुकी, जबकि वहां लोगों ने इस्लाम मानने से मना कर दिया है और तीन सौ पचास मस्जिदों को जला कर राख कर दिया* https://www.breakinguttarakhand.com/in-iran-the-protests-against-the-islamic-regime-which-have-been-ongoing-for-18-days-have-reportedly-resulted-in-the-massacre-of-twelve-thousand-muslims-by-the-government-furthermore-people-have/
सरकार इन्हें विदेशी साज़िश और अराजक तत्वों की कार्रवाई बता रही है लेकिन व्यवहारिक वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। विश्लेषकों के अनुसार आर्थिक दबाव,महंगाई,बेरोज़गारी और राजनीतिक असहमति को दबाने की नीति ने जनता के भीतर लंबे समय से जमा असंतोष को सतह पर ला दिया है। इरफान सुलतानी जैसे मामलों में मृत्युदंड की आशंका को कई लोग डर पैदा करने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं ताकि विरोध को जड़ से कुचला जा सके।
फांसी का संदेश: न्याय या चेतावनी?
ईरान में मृत्युदंड कोई नई बात नहीं है,लेकिन विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में फांसी की चर्चा सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करती है। यह कदम तीन संदेश देता है:
* राज्य किसी भी चुनौती को बर्दाश्त नहीं करेगा
* विरोध को अपराध के रूप में परिभाषित किया जा रहा है
* सत्ता अपनी वैधता बनाए रखने के लिए कठोरतम विकल्प चुनने को तैयार है
लेकिन इतिहास बताता है कि अत्यधिक दमन अक्सर डर से ज़्यादा गुस्सा पैदा करता है।
ट्रम्प की धमकी: मानवाधिकार या राजनीतिक अवसर?
डोनाल्ड ट्रम्प की चेतावनी को केवल मानवाधिकार के चश्मे से देखना अधूरा विश्लेषण होगा। ट्रम्प:
* पहले भी ईरान के खिलाफ सख्त रुख़ अपना चुके हैं
* घरेलू राजनीति में “कठोर नेता” की छवि बनाए रखना चाहते हैं
उनकी धमकी ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाती है लेकिन साथ ही तेहरान को यह कहने का मौका भी देती है कि देखिए हमारे विरोध के पीछे विदेशी ताकतें हैं यानी ट्रम्प की बयानबाज़ी ईरानी सरकार के नैरेटिव को मजबूत भी कर सकती है।
ईरान का जवाब: राष्ट्रवाद और दुश्मन की पहचान
तेहरान द्वारा ट्रम्प और नेतन्याहू को हत्यारा कहना केवल प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक राजनीतिक रणनीति है। इसका मकसद घरेलू स्तर पर राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारना जनता का ध्यान आंतरिक समस्याओं से हटाकर बाहरी दुश्मन की ओर मोड़ना ईरान लंबे समय से “हम बनाम वे की राजनीति पर टिके रहने की कोशिश करता रहा है। वर्तमान संकट में यह रणनीति फिर सक्रिय होती दिख रही है।
क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव असर डालेगा?
अब तक के अनुभव बताते हैं कि ईरान बाहरी दबाव में झुकने की जगह दमनात्मक षड्यंत्र अपनाता है। लेकिन इस बार अंतर यह है कि विरोध लंबा खिंच रहा है। युवा वर्ग खुलकर सड़कों पर है और वैश्विक मीडिया की दृष्टि निरंतर बनी हुई हैं। यदि फांसी दी जाती है तो प्रतिबंधों की चर्चा तेज़ हो सकती है। ईरान की कूटनीतिक स्थिति और अलग-थलग पड़ सकती है। देश के भीतर विरोध और उग्र हो सकता है
निष्कर्ष: ईरान एक चौराहे पर
इरफान सुलतानी की संभावित फांसी अब सिर्फ़ एक व्यक्ति की किस्मत का सवाल नहीं है। यह तय करेगी कि ईरान डर के ज़रिये स्थिरता चाहता है या संवाद के ज़रिये समाधान। इतिहास गवाह है जब सत्ता और जनता के बीच दूरी बहुत बढ़ जाती है तो हर कठोर कदम हालात को शांत करने की बजाय और भड़का सकता है। ईरान इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक फैसला पूरे देश की दिशा तय कर सकता है।
भारत में अक्सर नरेंद्र मोदी और RSS पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे नफ़रत की राजनीति करते हैं, हिंदू-मुस्लिम को बाँटते हैं।
लेकिन आज एक सीधा सवाल उठता है।
ईरान में जो हालात हैं, वहाँ सड़कों पर लोग सरकार और कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ खड़े हैं।
वहाँ न RSS है,
न मोदी जी हैं,
न हिंदू-मुस्लिम की राजनीति है।
फिर भी एक इस्लामिक देश में लोग
इस्लामिक कट्टरपंथ का विरोध क्यों कर रहे हैं?
महिलाएँ क्यों सड़कों पर उतर रही हैं?
युवाओं में ग़ुस्सा क्यों है?
सच यह है कि समस्या धर्म नहीं,
कट्टर सोच और ज़बरदस्ती है।
जब भी किसी देश में आज़ादी दबाई जाती है,
चाहे वह किसी भी मज़हब के नाम पर हो,
विरोध अपने-आप खड़ा हो जाता है।
यह सवाल उन लोगों से है
जो हर समस्या का ठीकरा भारत,
मोदी जी या RSS पर फोड़ देते हैं।
डिस्क्लेमर:
यह पोस्ट किसी धर्म, समुदाय या देश के ख़िलाफ़ नहीं है।
यह एक सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न और विचार है,
जिसका उद्देश्य नफ़रत नहीं, बल्कि चर्चा को बढ़ावा देना है।
हमारी तो राय यह है कि इस समय सचमुच ईरान में आरएसएस को सक्रिय होने की आवश्यकता है। बजरंग दल को सक्रिय होने की आवश्यकता है और वहां के अधर्मी विधर्मी म्लेच्छ लोगों को सनातन धर्म में वापसी करानी चाहिए क्योंकि ईरान वैसे भी परसिया था पर्शिया अर्थात फारस अर्थात भगवान परशुराम जी का कार्य क्षेत्र। इसलिए वहां गुरुकुल शिक्षा आरंभ करनी चाहिए नहीं तो ईरान के म्लेच्छ चाहे मुस्लिम कट्टर पंथी रहें या इसाई वे रहेंगे गो भक्षी ही, आवश्यकता है उनको मनुष्य बनाने की, ये कार्य बहुत आवश्यक है अन्यथा वहां ईसाई मिशनरियों का कब्जा तय है।
